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अपनी तथा आप सबों की अभिव्यक्ति का आकांक्षी

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Rajesh Dubey


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देश की अस्मिता का प्रश्न

Posted On: 30 Nov, 2016  
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फँस गए कपिल शर्मा

Posted On: 10 Sep, 2016  
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दाना मांझी ने सबको झकझोर दिया

Posted On: 26 Aug, 2016  
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राजनीती के शिकार हुए “राजन”

Posted On: 19 Jun, 2016  
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Politics में

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बिहार में शराबबंदी, सकारात्मक पहल

Posted On: 6 Apr, 2016  
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हमारे बेटे कब तक शहीद होते रहेंगे ?

Posted On: 7 Jan, 2016  
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जो नौकरी नहीं करते हैं

Posted On: 26 Nov, 2015  
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विकाश की पृष्टभूमि

Posted On: 1 Nov, 2015  
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कम मतदान, चिंतनीय

Posted On: 30 Oct, 2015  
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सारी पार्टियां राजनीति नहीं करें

Posted On: 26 Apr, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

पाकिस्तान द्वारा बार बार हमारे जाबांज सैनिकों का मारा जाना और और उस मौत को शहीद कह के छुट्टी कर लेना आज सर्कार का खाना पूर्ति जैसा काम हो गया है .उधर दुश्मन देश जो दुर्भाग्य से अपना पडोसी देश है वो रोज रोज हमें धमकी देता है की वह एक परमाणु संपन्न देश है कभी भी परमाणु हमला कर सकता है तब जवाब में अपने हुक्मरान भी कहते हैं धौंस न दिया करो हम भी परमाणु अश्त्र रखे हैं . यह सब एक चर्चा परिचर्चा जैसा विषय बना हुवा है .मैं अपना जवान बीटा खो रहीं हैं तो बहुएं विधवा हो रहीं हैं परिवार का कमाने वाला बीटा चला जाता है और उसके सामने पूरी जिदगी पड़ी है .उनपर क्या बीत रही है इसका ख्याल किसीको है कुछ लाख रूपये दे देने से मात्र से उनका दुःख दर्द काम हो जाता है है क्या ? आज देश की जनता पाकिस्तान से बदला चाहती है , उनके जितने भी आतंकी कैम्प हैं उनको बिना वख्त गवाये तहस नहस कर देने हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए आखिर हमारी सर्कार अपने सैन्य बल को इतना कमजोर क्यों समझ रही है ? जरूर हमारी ट्रेनिंग कहीं से कमी आ गयी है वार्ना पाकिस्तानी हमें यूँ ही मार करके नहीं चले जाते . इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए . एक अच्छा लेख जो सरकार और सेना दोनों की सच्चाई बयां करता है

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

वास्तव में आज़ाद हम तभी कहलायेंगे जब दाना मांझी जैसे गरीबों को भी उनके परिजनोँ की मृत्यु के बाद लाश को ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस मिले और दाह संस्कार एवं अंतिम क्रिया के लिए आर्थिक सहायता भी मिले .लेकिन इस देश में जिओ के खरीदार हैं और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित हो सके इसके लिए हीं अपने प्रधानम्नत्री चिंतित हैं दाना मांझी जैसे गरीब लोगों के साथ क्या गुजरी इसकी खबर उड़ीसा के नेताओं एवं प्रधानमंत्री को कभी नहीं मिलेगी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव यु ही नहीं भारत को प्राप्त है जी. . डी. पी बढ़ रहा है आर्थिक तरक्की हो रही है विश्व को दिखाना है. अब ऐसे में दाना मांझी के हथ्थे क्या आएगा यह तो भगवन जाने , उड़ीसा का काला हांडी इलाका तो वैसे भी भुखमरी के लिए मशहूर है . राजेश आपका लेख जरूर समाज एवं प्रशासन को आईना दिखानेवाला है लेकिन देखकर अनदेखी करनेवालों के लिए क्या है ?

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

राजेश जी, नमस्ते ! समय निकल जाता है लेकिन इत्तिहास अपनी छाप पीछे छोड़ जाता है ! आपने कारगिल की बात की ! लेह लदाक कारगिल में एशिया की सबसे ऊंची बर्फीली चोटी टाइगर हिल है ! जहां बारह महीने बर्फ रहती है और हर समय ठंडी हवाओं का जोर रहता है ! चार महीने तो लगातार बर्फ पड़ती रहती है और बर्फ की चट्टाने खड़ी हो जाती है, बंकरों में जहां सैना के जवान अराउंड दी क्लॉक ड्यूटी देते हैं, उन्हें आक्सीजन की कमी होने से कही प्रकार की बीमारियां पकड़ लेती है, इसलिए ३ से ४ महीने के लिए इन पोस्टों को छोड़ का जवान नीचे उत्तर जाते थे ! इसका फ़ायदा वहीं के लोकल पाकिस्तानी पालित आंतकवादियों ने जो इलाके की बर्फीली चट्टानों और मौसम से भली भाँती परिचित थे, पाकिस्तानी आईएसआई और सैना की मदद से उन टाइगर हिल और आस पास की टेकड़ियों पर कब्जा कर दिया था ! कम से कम हजार सैनिकों के बलिदान देकर ही इन पोस्टों को दुश्मन के कब्जे से छुड़ा पाए थे भारतीय सैनिक ! सजग रहने की जरूरत है हमें भी और भरतीय रक्षा पंक्तियों को ! अच्छी लेख के लिए साधुवाद !

के द्वारा: harirawat harirawat

प्रत्येक यात्री जब चाहे यात्रा कर सके इसके लिए चिंतन की जरुरत है. बहादुरी इसमें नहीं है कि रेलवे जनता के जेब से कितना पैसा निकाल लेती है, बहादुरी इसमें है कि रेलवे अपने प्रतिभा संम्पन विशाल कार्य-कर्ताओं से कम पैसे में कितना अधिक से अधिक जनता को लाभ दे सकता है. वैसे जब लोगों को जाना होता है तो इस मन: स्थिति में होते हैं कि बाथरूम के पास बैठने में भी उन्हें तनिक संकोच नहीं होता है. वर्तमान में ट्रेनों की स्थिति को देख कर तो यही दीखता है कि लोगों को सिर्फ अपने गंतव्य तक जाने की पहली प्राथमिकता होती है. अभी जरुरत है, पहली प्राथमिकता पर विजय प्राप्त करने की. रेलवे को भी अब अपनी बेशर्मी को छोड़ना चाहिए और लोगों को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि लोगों के अनुरूप रेलवे तैयार है और लोग जब चाहे आ जा सकते हैं. यात्री किराया जब भी बढ़ता है, लोगों को ठीक नहीं लगता है. रेलवे को अपने को इस तरह बनाना होगा कि लोग ख़ुशी-ख़ुशी कहने की स्थिति में हों कि रेलवे को अब किराया बढ़ा लेना चाहिए. रेलवे को अक्षम नहीं, सक्षम होना चाहिए. आपसे पूरी तरह सहमत आदरणीय राजेश दुबे जी... वेटिंग लिस्ट वाले या कन्फर्म वाले सबकी स्थिति एक जैसी हो गयी ...९० यात्रियों के बैठने की जगह में ७०० यात्री कैसे गए होंगे हम सब अनुमान लगा सकते हैं......

के द्वारा: jlsingh jlsingh

चुनाव में बढ़ता खर्च लोकतंत्र के लिए अति हानिकारक है क्यूंकी चुनाव उपरांत नेतागण चुनाव में खर्च होने वाले पैसों की उगाही ५ साल तक अपने चमचो एवं रिश्तेदारों के माध्यम से करते हैं अगर इसी का नाम लोकतंत्र है तो ऐसे तंत्र से जनता को निजात चाहिए चुनाव के दौरान सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अरबों का खर्च इस चुनाव में हुवा है इसके आलावा नेताओं द्वारा गलत और भ्रष्ट तरीके से उगाहा गया धन का प्रयोग सभी चुनावों में होता है और चुनाव आयोग हर बार स्वतन्त्र और निस्पक्ष चुनाव कराये जाने का दवा ठोकता है . मेरी राय में चुनाव को कुछ वर्षों तक रोक दिया जाए और अगर च हनी हुयी सरकार जनता के हिट में काम नहीं करती तो उसे गिराने का अधिकार जनता को दिया जाए और फिर चुनाव न करके देश के काम को अधिकारीयों के जिम्मे छोड़ा जाये जो जनता के लिए जवाबदेह हो और देश के न्यायालय भ्रष्ट अधिकारीयों को जल्द से जल्द सजा दिलाने में सक्षम हों कुछ ऐसा प्रयोग करने की जरूरत है हर हाल में भ्रष्ट लोगों को जेल में होना निहायत जरूरी है और इसे देश का सर्वोच्च न्याययालय ही करने में सक्षम है पर चुनाव में देश का अरबों खर्च करना लोकतंत्र को हमेशा के लिए कमजोर करने वाली बात है मेरी राय हो सकता है न जचे पर चुनाव में भारत जैसे गरीब देश का इतना सारा धन का बर्बाद होना भी कहीं से जायज नहीं इसपर चर्चा होनी चाहिए एक अच्छा आलेख

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

जैसे हम खरीदारी के दौरान एक-एक चीजों को उलट-पलट कर देखते हैं, आलू-प्याज को भी चुन कर लेते हैं, पर जन-प्रतिनिधि का चयन करने में उदासीन हो जाते हैं. जनता चुनाव के महत्व को क्यों नही समझती है? इसके लिए कौन दोषी? बिवेचन की जरुरत है. जनता को जगाये बिना देश नहीं जागेगा और हर चुनाव में महंगाई बढ़ने से खर्चे बढ़ जायेगा की नीति देश में चलती रहेगी. इस खर्चीली चुनाव से निजात पाना देश के लिए नितांत आवश्यक है. प्रिय राजेश दुबे जी, आपका कहना बिलकुल सही है ...पर क्या कहें हमारे मित्रगणों में कुछ लोग ऐसे थे जिन्हे भाजपा प्रत्याशी का नाम भी नहीं पता था और उन्होंने मोदी के नाम से कमल का बटन दबा दिया ...मीडिया रिपोर्ट में भी सुना होगा आपने की जहाँ भाजपा की सहयोगी दाल था वहां भी लोग कमल का निशान खोज रहे थे. अभी बहुत ज्यादा जागरूकता और राजनैतिक समझ की जरूरत है साथ ही साथ मैं हमेशा यही कहता हूँ अच्छे और ईमानदार लोगों को राजनीति में आने की जरूरत है...सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

राजेश बहुत सटीक ब्याख्या की है राजनीती एवं रजनितबाजों की और खासकर लालू जी के सन्दर्भ में क्यूंकी कल तक वे गठबंधन नहीं अब लठबंधन होगा कह रहे थे और आज कह रहें हैं बात चीत अभी हो रही है कांग्रेस डूबती नईया है अतः उस पर सवारी शायद ही कोई करना चाहे और इस चुनाव में साम्प्रदायिकता गौण हो गयी है अब नमो टी ,कुली दर्शन, रिक्शा चालन और झाड़ू यही सब राजनीती में हो रहा है आपका यह सुझाव बिलकुल सही है कि कोई ऐसे तंत्र का विकास जरूर होना चाहिए जो तंत्र चुनाव बाद वादे नहीं निभाने वालों को जेल का रास्ता दिखा सके वरना जब जब चुनाव आएगा ये नेता ये पार्टियां जनता को यु ही झूठे वायदों से बरगलाते रहेंगे एक सही आलेख

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

आज जरुरत हैं, देश में एक सशक्त कानून पालक की. सत्ता की सलामती के लिए देश को कमजोर करने वाली ताकतों से समझौता नहीं करनेवाले लोगों की. नस्लीय भेद-भाव का भारत जैसे देश में कोई स्थान नहीं है. बहुसंख्यक लोग इस भेद-भाव से नाखुश हैं, पर सत्ता के दबंगों के कारण लाचार भी हैं. अगर जान भावनावों के विपरीत इस तरह के नस्लीय और क्षेत्रीय विषमता का विष-बेल को ख़त्म नहीं किया गया तो, जनता विद्रोह कर बैठेगी और सत्ता के मठाधीशों को देश छोड़ कर भागना पड़ेगा. बिलकुल सही कहा है आपने, आदरणीय राजेश जी! फर्क यही है अभी तक बिहारियों को जन माल से हाथ धोना पड़ता था आज पूर्वोत्तर के युवक दिल्ली शिकार हो रहे हैं. गलत गलत ही होता है पर यह सब बिना किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय संगठन के उकसावे के बिना नहीं होता ...आम जन शांतिप्रिय होता है और अपने कम से वास्ता रखता है.....सामयिक आलेख के लिए बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

विश्व में हिंदी का सम्मान है. अपने देश में भले ही अधकचरे ज्ञानियों के द्वारा हिंदी गवारों की भाषा हो सकती है, पर दुसरे देश के लोग हिंदी को ललचाई नजरों से देखते हैं. रूस जैसे देश के सिनेमा घरों में हिंदी सिनेमा दिखाया जाता है. इतना ही नहीं हॉल में भीड़ भारत से ज्यादा होती है. चीनी आकाशवाणी द्वारा हिंदी में भी कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है. विश्व के कई देश अपने कार्य-क्रम हिंदी में भी प्रसारित करते हैं. विदेशी रेडिओ बीबीसी द्वारा हिंदी के समाचार हिंदी के गौरव और सम्मान को दर्शाता है. जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड,यूएई क़े एफ एम रेडियो “हम” तथा अन्य कई ऐसे देश हैं जहाँ के दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित होते हैं. विदेशी माध्यमों द्वारा हिंदी में कार्य-क्रम हिंदी के सम्मान को दर्शाता है. आदरणीय राजेश जी, सादर! इसीलिये हम सबको यानी हम भारतीयों को भी हिंदी को यथाचित सम्मान देना ही चैये!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: manoranjanthakur manoranjanthakur

निश्चीत रूप से नितीश की यह सोंच देश विरोधी ,जनविरोधी और सैनिकों का मनोबल तोड़नेवाली है इन नेताओं को क्या पता किन दुर्गम परिस्थितियों में सीमा पर नौजवान अपनी ड्यूटी निभाते हैं और ये नेता एवं देश की तमाम जनता अपने घरों में चैन की नींद सोती है यह उन बहादुर सैनिकों की कर्तब्य्परयनता का ही परिणाम है और उसपर शहीदों की सहादत पर उनका अपमान करना क्या दर्शाता है? सचमुच नितीश बहुत घमंडी हो गए हैं और उनकी पार्टी के मंत्री तो उन से एक कदम आगे हैं जो यह बयान देते हैं की सेना और पुलिस में लोग शहीद होने और मरने के लिए ही तो जाते हैं उनकी नजर में यह अमर बलिदानी महज एक मजाक है उन मंत्री से यह तो पूछा जाये की एक मंत्री किस काम के लिए होते हैं क्या जनता के पैसों पर ऐशो आराम के लिए होते हैं तिकड़म बाजी करके शासन में बने रहने के लिए होते हैं अन्ना हजारे ने इन नेताओं को याद दिलाया था की वे राजा नहीं इस देश की जनता के सेवक हैं उनको चुनकर जनता ने देश की जनता के जीवन में खुशहाली और शासन एवं न्यायपालिका के माध्यम से जनता को न्याय दिलाने के लिए चुन के जनता ने भेज है ये नेता तो अपने कर्तब्य को भूल गए हैं पर शहीदों के परिवारों के प्रति सम्मान ब्यक्त करने के बजाय उनकी सहादत का मजाक उड़ाना ही जानते है जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा एक अच्छा आलेख

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

के द्वारा: nishamittal nishamittal

चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के बहाने नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री तक पहुचाने वाले लोग इस बात को भूल गए कि गुजरात में भाजपा की मजबूती की वजह सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं है. अगर बहुमत में भाजपा आया है तो, इसका श्रेय पूरी पार्टी के साथ-साथ पुरे गठबंधन को देना पड़ेगा. नरेन्द्र मोदी को या उनके समर्थकों को कहीं ये भ्रम हो गया है कि नरेन्द्र मोदी के बल पर चुनावी सागर को पार कर लेंगे, तो इसे नादानी भरा सोच ही कहा जायेगा. आडवानी जी की, नरेन्द्र मोदी के नाम पर उपेक्षा करना भाजपा के नैतिकता के विरुद्ध है. अभी वर्तमान में अगर गठबंधन के सभी दलों के लोगों की नजरों से देखा जाय तो नरेन्द्र मोदी किसी लायक नहीं दीखते हैं. गठबंधन के दल लीडर के रूप में सिर्फ आडवानी को ही देखता है.मुझे लगता है , बारिश के मौसम में भाजपा और साफ़ सुथरी हो रही है ! जो कीटाणु इससे चिपक गए थे , वो बारिश में धुल रहे हैं और भाजपा अपना असली और सात्विक रूप ग्रहण कर रही है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के बहाने नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री तक पहुचाने वाले लोग इस बात को भूल गए कि गुजरात में भाजपा की मजबूती की वजह सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही नहीं है. अगर बहुमत में भाजपा आया है तो, इसका श्रेय पूरी पार्टी के साथ-साथ पुरे गठबंधन को देना पड़ेगा. नरेन्द्र मोदी को या उनके समर्थकों को कहीं ये भ्रम हो गया है कि नरेन्द्र मोदी के बल पर चुनावी सागर को पार कर लेंगे, तो इसे नादानी भरा सोच ही कहा जायेगा. आडवानी जी की, नरेन्द्र मोदी के नाम पर उपेक्षा करना भाजपा के नैतिकता के विरुद्ध है. अभी वर्तमान में अगर गठबंधन के सभी दलों के लोगों की नजरों से देखा जाय तो नरेन्द्र मोदी किसी लायक नहीं दीखते हैं. गठबंधन के दल लीडर के रूप में सिर्फ आडवानी को ही देखता है. भाजपा एक कैडर वाली हिंदुत्व की पार्टी है हिन्दू मतलब हिन्दुस्तान और हिंदुस्तान मतलब हिन्दू. भाजपा मतलब मोदी मोदी मतलब भाजपा ... आज कुछ टी वी चैनेल पर भाजपा नेताओं के मुख से सुनने को मिला मोदी 'पिछड़ों' के नेता हैं. नीतीश के बिछुड़ने के बाद अब मोदी में पिछड़ा नजर आने लगा, आज से पहले यह सब सुनने को नहीं मिला था .... धन्य है राजनीति और और धन्य है भाजपा ... कांग्रेस को खूब मजा आ रहा है, शायद यही लोग चाहते थे. आज गिरिराज सिंह ने नीतीश को भष्मासुरकहते हुए उन्हें जहन्नुम में भी भेज दिया .. मजा तो खूब आ रहा है, मीडिया को भी, कांग्रेस को भी और लालू जी को भी....... जनता तो बेचारी है, किसको चुने?

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

सर्वप्रथम राजेश जी आपको बधाई हो की आपने समाज का एक ज्वलंत मुद्दा उठाकर जागरण टीम का मन मोह लिया और आपके लेख को दैनिक जागरण पेपर पर जगह भी मिल गई। "समलैंगिकता एक विकृति" क्या खूब शीर्षक रखा है आपने। मैं इस मुद्दे पर आपसे कोई बहस नहीं करना चाहता क्यूंकि आप जैसे संकीर्ण मानसिकता वाले व्यक्ति को समझाना या तर्क करना बेवकूफी होगी। आपके लेख में विकृति शब्द का प्रयोग बहुत अच्छे से हुआ है जिसे देखकर लगता है कोई विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति ही "विकृति" शब्द का प्रयोग इतने अच्छे ढंग से और इतनी अच्छी जगह कर सकता है। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूँगा की समलैंगिक होना और समलैंगिक होकर अनुचित कार्य करना दोनों अलग अलग बाते है। समलैंगिकता अपने आप में न तो अनैतिक है और न ही कोई विकृति। ये बात तो आप भी अच्छी तरह समझते होंगे की आपके हिसाब से जो सामान्य मनुष्य है जिनमे कोई विकृति नहीं है वो भी ऐसे-ऐसे काम कर रहे है की ........... शब्द नहीं है मेरे पास उनका उल्लेख करने के लिए ........ मैं लेख बड़ा करने के पक्ष में नहीं हूँ बस इतना ही कहना चाहता हूँ की आज के प्रबुद्ध लोग और युवा ये बात बखूबी समझते है के समलैंगिक होना और समलैंगिक होकर अनैतिक कार्य करना दोनों में जमींन -आसमान का फर्क है। बुरे कार्य करने वाले समलैंगिको के कारन समलैंगिकता को ही विकृति कह देना कहाँ की समझदारी है ? और आज का आदमी वासना के वशीभूत होकर नारी पर ऐसे- ऐसे घृणित अत्याचार कर रहा है जिसकी तो तुलना ही नहीं की जा सकती,उसके बारे में आप क्या कहेंगे ? अंत में जागरण टीम से मैं ये अनुरोध करना चाहूँगा की ऐसे संवेदनशील मुद्दो पर संकीर्ण सोच रखने वाले लोगो के ऐसे लेखो को केवल "मिर्च मसाले वाले लेख " की चाहत रखकर कम से कम पेपर में प्रकाशित करने का कष्ट न करे। क्यूंकि मुझे पूरा विश्वास है के आप और साथ-साथ जागरूक समाज आज वास्तव में दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को सहृदय स्वीकार करता है जिसमे बालिग व्यक्ति द्वारा आपसी सहमती से बने समलैंगिक सम्बन्ध न तो किसी अपराध की श्रेणी में आते है न ही किसी विकृति के।

के द्वारा:

है की गरीबी से त्रस्त लोगों के बीच में भी सरकारी तंत्र नकसलियों की तरह जन अदालत लगाकर ईमानदारी से काम करे. नक्सलियों को जिन गरीबों के बीच में आश्रय मिलता है, उन गरीबों के बीच में सरकार और पुलिस के प्रति भय और नफरत के भाव को ख़त्म करने का वातावरण तैयार हो. . अक्सर व्यवहार में देखा जाता है कि किसी घटना के बाद पुलिस पर घटना में शामिल लोगों की गिरफ्तारी का दबाव बनता है. गिरफ्तारी नहीं होने की स्थिति में उन्हें निलंबित होना पड़ता है. ऐसे में पुलिस के लोग निर्दोष लोगों को भी गिरफ्तार कर घटना में शामिल होने का दोष मढ़ देते हैं. इस तरह से निर्दोष लोगों के बीच में पुलिस और सरकार की छवि प्रताड़ित करने वालों के रूप में बनती है. बहुत सारे आदिवासी इलाकों में आदिवासियों द्वारा सत्याग्रह और गांधीवादी तरीकों से आन्दोलन चलाया जाता रहा है. सरकार की गांधीवाद और सत्याग्रह की भाषा नहीं समझने की स्थिति में भी लोगों का रुझान नक्सलवाद की तरफ बढ़ जाता है. मेघा पाटकर जैसी सामाजिक कार्य-कर्ता ने भी इस बात को स्वीकार किया है. जिन परियोजनाओं का विरोध आदिवासी गांधीवादी तरीके, सही लिखा है आपने श्री राजेश जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय राजेश जी, सादर अभिवादन! अगर देखा जाय तो सारी समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार ही है चे वो नक्सलवाद हो, आतंकवाद हो, या गरीबी, बेरोजगारी हो! जिस दिन हमारा तंत्र इमानदार हो जाएगा भारतफिर से सोने की चिड़िया हो जायेगा ..लेकिन वे (भ्रष्ट तंत्र) भला क्यों चाहेंगे? आप क्या देख नहीं रहे हैं हर भ्रष्टाचार के उजागर के बाद कैसे लीपा पोती की जाती है. मनरेगा मुख्य रूप से पिचादे इलाके का गरीबो के लिए चलायी गयी योजना है, पर उसमे भी ब्याप्त भ्रष्टाचार गरीबों तक उसका लाभ पहुँचाने कहाँ देती है? अधिकांश जॉब कार्ड अमीरों और दबंगो के नाम होते हैं और सारा बन्दर बाँट वे कर लेते हैं ...अब तो नक्सलियों का भी इस्तेमाल वोट बैंक के रूप में होने लगा है और उनके दिमाग में जहर भरने वाले भी कुछ कथित नेता ही होते हैं जिन्हें प्रशासन और तंत्र दोनों जगह से संरक्षण प्राप्त है ... बहुत कुछ करना है लेकिन करेंगे तब न! अब आईपीएल और BCCI का खेल देख रहे हैं न? इसको अगर नक्सलियों के बीच नमक-मिर्च लगाकर बाते जय तो क्या प्रभाव पड़ेगा उनपर फिर अगला निशान कौन हो सकता है ? मेधा पाटेकर, स्वामी अग्निवेश, दीपंकर भट्टाचार्य आदि कुछ नक्सलियों के हिमायती कहे जाते हैं पर सरकार इनकी सुने तब न?

के द्वारा: jlsingh jlsingh

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जागरूकता हमारे देश में नहीं पैदा हुई. जागरूकता के अभाव में जनतंत्र का दुरूपयोग आसानी से हो रहा है. आजादी के 65 -66 सालों के लम्बे अन्तराल में भारतीय जनता, मतदाता की गरिमा को नहीं समझ सकी. लोकतंत्र में देश के विकाश का सम्वन्ध मतदान से है, इस बात की मर्यादा से मतदाता अनजान हैं. इस जागरूकता को पैदा करने की जवाव-देहि जिन्हें थी, निश्चित वे लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण इस जागरूकता को नहीं फैला पाए. पर यह देश के लिए गद्दारी भरा कदम है. विश्व बिरादरी में देश को कमजोर करने वाला कदम है. प्रिय राजेश जी, सादर अभिवादन! जागरूकता और शत प्रतिशत मतदान की अत्यन्त आवश्यकता है. हम शिक्षित वर्ग ही मतदान में कम भाग लेते हैं यह आंकड़ा बतलाता है, अत: मतदान अवश्य करें और सोच समझ कर करें या ज्यादा जरूरी है. विचार रखने के लिए आपका आभार!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: jlsingh jlsingh

राजेश जी आपने एक अच्छा लेख लिखा है और आपने सुषमा जी को जिस तरह प्रोजेक्ट किया है उस हिसाब से निस्संदेह भाजपा को निर्विवादित नाम जो की सुषमा जी का उसको ही प्रस्तुत करना चाहिए . लेकिन इन सब बातों से इतर मेरा यह कहना है की बीजेपी के आलावा एन डी ए गठबंधन के घटक दल मिल बैठ कर इसकी चर्चा करते तो मिडिया का इतना वक्त इस पर बर्बाद नहीं होता क्यूंकि हर हाल में प्रधानमंत्री उम्मीदवार जिस भी पार्टी का होगा वह सर्वमान्य ब्यक्ति ही होना चाहिए लेकिन यह बहस जदयू और बीजेपी के बीच ही इतने दिनों से चल रहा है जहाँ तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है वे एक मजबूत राजनीतिग्य की तरह उभरे हैं और उनको सांप्रदायिक केवल कांग्रेस कहती है समाजवादी तो बीजेपी के साथ यु पि में सरकार चला चुके हैं वैसे मायावती की बहुजन समाज पार्टी भी बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुकी है रही बात जदयू की तो बिहार में जदयू बीजेपी के साथ मिलकर ही सरकार चला रही है यह बहस केवल मूंछ की लडाई जैसी बनकर रह गयी है क्यूंकि नितीश को भी लगने लगा है की वे राष्ट्रिय नेता की कटेगरी में आ गए हैं पर उनको तो प्रदेश में ही काला झंडा दिखाया जा रहा है क्यूंकि भ्रष्टाचार के मामले में उनकी सरकार कांग्रेस से बिलकुल कमतर नहीं है अतः उचित यही होगा की राष्ट्रिय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग ) की सारे घटक दल एक मंच पर बैठे और अपना नेता चुने तभी यह बहस थमेगी वरना यह तो कांग्रेस को सरकार चलाने और भ्रष्टाचार करने का अवसर देना ही होगा ऐसी बहस को जारी रखने से कांग्रेस का फ़ायदा मुझे तो नजर आ रहा है वह भी सोंच रही है अच्छा है जनता का ध्यान प्रधानमंत्री कौन बनेगा? इसमें लगा है घोटाले और कर लो, किसी घोटाले का खुलासा होकर भी क्या होना है? हम बहुमत में हैं २०१४ मई तक सरकार में रहेंगे चुनाव वक्त पर ही होगा बेशक संसद चले या यु हंगामें के भेंट चढ़ जाये और जनता का क्या है इनको तो जिस और हांको उधर भेदिया धसान मचहते चल देंगे क्या यही लोकतंत्र है ?

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

भाजपा के महिला नेत्री होने से सुषमा स्वराज से ज्यादा भाजपा प्रतिष्ठित हुई है. एक सर्वेक्षण में सोनिया गाँधी से ज्यादा लोकप्रिय सुषमा स्वराज को बताया गया है. भारतीय राजनीती में प्रथम स्थान सुषमा स्वराज का सर्वेक्षण के अनुसार है. मोदी जी हमेशा विवादों में रहे हैं. गोधरा कांड का चाहे जो भी सच हो पर हमारे जैसा आम आदमी इनको दोषी मानता है. शब्दों की जादूगरी में माहिर नरेन्द्र मोदी को ये बात समझ में आनी चाहिए कि बात चाहे जितना भी सुन्दर कह दिया जाय पर सच्चाई भी एक चीज है. सुषमा स्वराज में नरेन्द्र मोदी की तुलना में ज्यादा गुण है.भाजपा के महिला नेत्री होने से सुषमा स्वराज से ज्यादा भाजपा प्रतिष्ठित हुई है. एक सर्वेक्षण में सोनिया गाँधी से ज्यादा लोकप्रिय सुषमा स्वराज को बताया गया है. भारतीय राजनीती में प्रथम स्थान सुषमा स्वराज का सर्वेक्षण के अनुसार है. मोदी जी हमेशा विवादों में रहे हैं. गोधरा कांड का चाहे जो भी सच हो पर हमारे जैसा आम आदमी इनको दोषी मानता है. शब्दों की जादूगरी में माहिर नरेन्द्र मोदी को ये बात समझ में आनी चाहिए कि बात चाहे जितना भी सुन्दर कह दिया जाय पर सच्चाई भी एक चीज है. सुषमा स्वराज में नरेन्द्र मोदी की तुलना में ज्यादा गुण है.दुनिया मोदी मोदी चिल्ला रही है , आप सुषमा पर अटक रहे हैं ! लेकिन आपने जिन बातों का जिक्र किया है सोचने पर मजबूर तो करती हैं की क्यूँ न सुषमा स्वराज को भी ये जिम्मेदारी मिले !

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अरविन्द केजरीवाल की राजनीती आम आदमी की राजनीती है. अरविन्द केजरीवाल को इसके लिए त्याग और संघर्ष करना पड़ा है. राहुल गाँधी और अखिलेश यादव जैसा अरविन्द को राजनीती विरासत में किसी राजा के राज-पाट की तरह नहीं मिला है. नरेन्द्र मोदी की तरह किसी पार्टी का बैनर भी अरविन्द केजरीवाल के पास नहीं है. इनके पास जो भी है अपने द्वारा गढ़ा हुआ जनता के विश्वास के बल पर है. अरविन्द केजरीवाल के पास राजनैतिक पार्टी बनाकर राजनीती के रास्ते विधान सभा और लोकसभा में पहुचने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं है. जिस अन्ना के उपवास नें भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों पर जनता को आंदोलित कर भारत से दूर विदेशों में तक अपनी आवाज पहुचाई उस आन्दोलन का क्या हस्र हुआ? भरष्टाचार के रास्ते चुने हुए जनप्रतिनिधि अन्ना और उस आन्दोलन के लोगों को अवैध जन-प्रतिनिधि कहने लगे. मिडिया में सभी भ्रष्ट पार्टियाँ कह रही थी की चुने हुए प्रतिनिधि हम हैं बहस करना है तो चुन कर आइये, और संसद में बहस करिए. ऐसे में राजनीती पार्टी के रास्ते संसद में पहुचने का लक्ष्य मज़बूरी बन गई है. बस यही कहूँगा राजेश जी की जो दीखता है वोही बिकता है !

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बाजार में एक ही बार कबीर गए. अब वे बाज़ार नहीं जाते हैं. घर जराने वाले अब बाज़ार में मिलते ही नहीं. कबीर को घर जराने वाले जब नहीं मिले थे तब दुनिया में जबरदस्त चर्चा हुई थी. ज्ञानियों के लिए शर्मिंदगी की बात थी कि घर जराने का ज्ञान उन्होंने क्यों नहीं दिया और अगर दिया तो वे लोग कहाँ गायब हो गए. आज के दिन में घर जराने वाला कोई होगा, सोचा भी नहीं जा सकता है. “अयं निज पारो वेति गणना लघु चेतसाम” की बाते करने वाले पर लोग हंसते है. पर ये चिंता की बात है की घर जराने वाले कहाँ चले गए.समाज में घर जराने वाले नहीं रहेंगे तो इस समाज का क्या होगा? समाज की चिंता करनी होगी. मनुष्य जिस मुकाम पर आज पहुंचा है, यूँ ही नहीं पंहुचा है. पूर्वजों की कुर्बानियों को भुला नहीं जा सकता है. भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्रबोष जैसे तमाम शहीदों की क़ुरबानी से समाज का निर्माण होता है. मानव के जीवन काल से समाज के लिए हमारे अनगिनत पीढियों के पूर्वजों ने अपना घर जराया होगा, तब हम आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं. घर जराने के परम्परा को ख़त्म करने का मतलब मजबूत समाज को कमजोर करना है.विचारणीय विषय राजेश जी

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भारत को मजबूत बनाने की जरुरत है. भारत को मजबूत बनाने के लिए दोहरे सोच पर आधारित व्यवस्था ख़त्म करनी पड़ेगी. जिनके ऊपर न्याय की जिम्मेवारी है, उन्हें निष्पक्ष न्याय करना पड़ेगा. रक्षा की जवाबदेही जिनके ऊपर है, उन्हें अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर देश हित में सोचना पड़ेगा. भाई-भतीजावाद को तिलांजली देनी पड़ेगी. राजनीती पर आधारित किसी भी तरह का कार्य देश को कमजोर करता है. न्याय और अन्याय की परिभाषा जब तक पुरे देश के लिए,एक नहीं होगा, देश का कल्याण नहीं होने वाला है. आज वर्तमान में हम देखते है की सीबीआई का इस्तेमाल न्याय या देश हित में नहीं होता है. अपने प्रतिद्वंदियों को ठीक करने के लिए इसको संचालित करने वाले लोग इसका इस्तेमाल करते है. न्याय की प्रक्रिया में भी हम देखते हैं कि सिविल कोर्ट, हाई कोर्ट, और सुप्रीम कोर्ट, के फैसले अलग-अलग होते है. अफजल गुरु के फांसी को भी इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि आम आदमी समझ ही नहीं पा रहा है कि यह सजा है या राजनीती. कश्मीरियों के ऊपर पक्षपात का आरोप कितना सही है, बात इसकी नहीं है, बात ये है कि पक्षपात का आरोप आखिर क्यों लगा? इस तरह के आरोप लगने वाली छवि से ऊपर सरकार और देश क्यों नहीं है. देश की घुटना-टेक नीतियाँ कई बार उजागर हुई है और कई आतंकवादी घुटना-टेक नीति के तहत छोड़े गए है, लेकिन क्या आतंक वादियों को छोड़ देने से आतंकवाद रुका ? अगर नहीं रुका तो ये सोचनेवाली बात है कि रुबिया के लिए हमने आतंकवादियों से क्यों समझौता किया?आपने बहुत सही लिखा है ! सुरक्षा एजेंसियों को राजनीती से अलग रखा जाना चाहिए लेकिन शीर्ष स्तर पर मुझे लगता है शायद यही होता है ! वहां तक टुच्चे मुच्चे नेताओं की पहुँच तो नहीं होती होगी !

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. अखिलेश युवा और समझदार हैं, इस लिए उनसे अपेक्षा है, कि राजनीति कि गन्दी गलियों को साफ करें. उतर प्रदेश का राजनीति में अहम् स्थान है. उतर प्रदेश में बिगुल बजता है तो सारा देश में सुनाई पड़ता है. अब वक्त की मांग है कि युवा और राहुल के चमत्कार को फीका करने वाला चमत्कारी नौजवान अपने वंश वाद से अलग हट कर इतिहास में अपना स्थान बनाये. अन्य राज्य, और अन्य पार्टियों के राह से अलग एक रास्ता गढ़ कर अखिलेश को ये दिखा देना चाहिए कि राजनीति में अच्छे लोग भी हैं. अपना विकाश तो होते ही रहता है. राज्य की विकाश की भी प्राथमिकता होनी चहिये. अखिलेश राजनीति में पथ प्रदर्शक हो सकते है. लेकिन स्पष्ट रूप से कहूँ तो जितनी अपेक्षाएं अखिलेश से जनता ने राखी थी वो पूरी होती नहीं दीख रही हैं ! जब मुलायम सिंह राजनीतिक गन्दगी साफ़ करने की बात अपने मुंह से बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे वो कोई मज़ाक कर रहे हैं ! बहुत सटीक लेखन श्री राजेश दुबे जी !

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भाई राजेश जी सादर, सबको साथ लेकर चलने कि बात से हम अनचाहे ही यह कह रहे हैं कि मुस्लिमों को साथ लेकर चलना ही सबको साथ लेकर चलना है.आज नितीश का विरोध भी मात्र इस बात से है कि मुस्लिम मतदाता कहीं रूठ ना जाए अन्य नेताओं के समर्थन में भी यही बात स्पष्ट झलकती है.सच है कट्टरता इस देश के लिए सदैव ही गलत मानी जायेगी. किन्तु क्या सचमुच मोदी मुस्लिम विरोधी हैं या कि कांग्रेस उनकी यह छवि बनाकर राजनितिक लाभ लेना चाहती है? जनता इस सच्चाई को समझे तो मोदी में कोई बुराई नहीं वह कुशल नेतृत्व देने में सक्षम है.मै कोई मोदी जी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ मेरी पसंद कई और नेता भी हैं जिसमे शिवराज सिंह चौहान, शरद यादव जैसे कुशल नेतागण सर्वोच्च हैं मगर मै मोदी में भी कोई बुराई नहीं मानता.

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पश्चिमी सभ्यता को भारत के लोग इस लिए पसंद नहीं करते हैं कि वहां जीवन का मतलब आनंद के लिए है. अपने जीवन को जिन बातो में आनंद है वह किया जा सकता है. पश्चिमी सभ्यता में नैतिकता का कोई मतलब नहीं है. लेकिन भारतीय दर्शन में जीवन कल्याण के लिए है. अपने को कष्ट में रख कर भी ज्यादा से ज्यादा लोगों को कल्याण करना सर्वोतम है. भारतीय दर्शन नें भोग को बहुत पहले ही नकार दिया है. सृष्टि के क्रम में भोग को बहुत तुच्छ समझा गया है. लेकिन वर्तमान में भारतीय दर्शन के जगह पर पश्चिमी सभ्यता बलवती होने लगा है. जन-कल्याण से ज्यादा अपने भोग को प्रमुखता से लोग अंगीकार कर रहे हैं. नैतिकता के अभाव में जन के लिए जीव का समर्पण का भाव ख़त्म हो रहा है. आदरणीय श्री राजेश दुबे जी , सादर नमस्कार ! पश्चिम , भारतीय संस्कारों को अंगीकार कर रहा है और हम पश्चिम के संस्कारों को ! परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन ये परिवर्तन सार्थक नहीं दीखता ! बढ़िया पोस्ट

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इस लिए ये जरुरी है कि कड़ा कानून तो बने पर इसका झूठा इस्तेमाल करने वालों को भी कैसे रोक जाय इसका ध्यान रखा जाय. ऐसा देखने में आया है की पुलिस के ऊपर जब दबाव बनता है और जल्द अपराधियों की गिरफ्तारी का जन-दबाव होता है, तब पुलिस किसी को भी पकड़ कर अपराधी सिद्ध कर देती है, और अपना नौकरी बचाती है. निश्चित हीं पुलिस का ये तरीका समाज को तोड़ने वाला होता है न की जोड़ने वाला. इस लिए आज समीक्षा का विषय है की कानून को तोड़ने-मडोरने वाले लोगों के लिए तथा पुलिस और अपराधियों के लिए जो कानून के नाम पर गलत करते हैं, क्या करना चाहिए. हर आम आदमीं में कानून के द्वारा अमन-चैन मिलेगा का, सोंच नहीं हैं, वल्कि कानून के नाम पर प्रताड़ित और परेशान होने का भय है. किस किस को सम्झाइयेग श्री राजेश दुबे जी !

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राजेश मैं आपके लेख का शत प्रतिशत समर्थक हूँ , निस्संदेह निस्सनातन लोगों के लिए सरोगेट मदर एक वरदान के रूप में आज समाज को मिली हुयी है और यह एक परोपकारी कार्य ही कहा जायेगा क्यूंकि गोद लेने के इच्छुक दम्पति गोद लेने की प्रकिरिया की कठिनाईयों को देखते हुए काफी निरुत्साहित दिखाई देते हैं और उनकी संतान सुख की इच्छा पर कुठारा घात होता है क्यूंकि जितनी भी सरकारी प्रक्रियाएं या क़ानूनी अड़चन इस गोद लेने के मामले है उतना शायद ही किसी और के लिए हो जरुर कुछ मामलों में गोद लेने वाले गोद लिए बच्चे के साथ अत्याचार और अमानवीय ब्यवहार करते दिखाई पड़े हैं पर ऐसे में निर्दोष दम्पति भी अपनी इच्छाओं का हनन करते दिखाई पड़ते हैं अतः मेरी समझ से कोई महिला निस्संतान दम्पति के लिए किराये की कोख देने को तैयार होती है वह मानवता की मदद ही करती है और एक बच्चे को माँ बाप का प्यार और सहारा भी मिल पता है और यह एक अछि सामाजिक शुरुआत है इसको सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिए और देश के कानून को भी इसकी मदद करनी चाहिए तभी अनाथ बच्चे जो बेचारे हैं उनको भी एक अछि जिंदगी मिल पायेगी और इस तरह के बच्चों का आज शोसन समाज में हो रहा है उस पर भी लगाम लगेगी

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पुलिस की अघोषित कार्य प्रणाली देशवासी जानते हैं. कहने को तो ये जनता के रक्षक हैं, पर ये सच्चाई नहीं है. इनका काम रुपया वसूलना और लोकतंत्र के मठाधीशों के मनोनुकूल कार्य करना है. एक आवेदन भी ये बिना पैसे के स्वीकार नहीं करते. इनकी नजरिया समदर्शी है. ये रुपया वसूलने में किसी तरह का भेद-भाव नहीं करते हैं. पोस्मार्टम के लिए ले जाने के पहले बिना खर्चा लिए ये अपना काम नहीं करते. बलात्कार पीडिता हो, या दुर्घटना में अपने बेटे को गवां देने वाली मां हो, इनके नजर में रुपया देने वाली गाय हैं. दुबे साब , हर कोई इस बात को जानता और समझता है लेकिन कोई कुछ करता क्यूँ नहीं ? और ये कोई नयी बात भी नहीं है ये सब शायद आज़ादी से पहले या बाद में भी चलता रहा होगा !

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जनता की निराशा को आशा में बदल कर अरविन्द केजरीवाल सफलता की ओर बढ़ रहे हैं. महात्मा गाँधी जी ने जनता को लड़ने के लिए सिखाया था, और तब आजादी की लड़ाई सफल हुई थी. अभी वर्तमान में राजनीतिज्ञों से सशंकित जनता चेतन होते जा रही है. अरविन्द केजरीवाल को सिर्फ जनता को उनकी ताकत का अहसास करा देना है. उनमें ये जज्बा पैदा करा देना है कि भ्रष्टाचार से लड़ा जा सकता है. जनता के सामने सरकार और सरकार की गोली-बन्दुक भी फेल हो जाती है. ये बात जनता के समझ में आने लगी है. धन, पर और दारू-शराब से नहीं बिकने का भाव जनता के मन में जिस दिन पैदा हो जायेगा, उस दिन अरविन्द केजरीवाल का उद्देश्य सफल हो जायेगा. उम्मीद के दिए तो अरविन्द ने जामगा ही दिए हैं ! देखना है लौ अब अपने शबाब पर कब तक आती है ! सार्थक लेखन

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आदरणीय राजेश जी ,..सादर प्रणाम आपके संवेदनशील भाव अच्छे हैं ,..मेरे विचार से अरविन्द जी पर भरोसा करना अभी उचित नहीं लगता है ,...कारण एक नहीं कई हैं ,....देश के सामने बहुत चुनौतियाँ हैं ,..एकजुटता से ही यह जंग जीती जा सकती है ,..एकला चलो का भाव जहाँ अहंकारी स्वभाव दर्शाता है वहीँ गर्म मुद्दे पर राजनीति चमकाने की अवसरवादिता भी स्पष्ट है ,..आपको याद होगा कि नौ अगस्त से बाबा रामदेव का अनशन पूर्व निर्धारित था ,...इन्होने पचीस से ही तामझाम शुरू कर दिया ,...इससे पहले भी इनकी अवसरवादिता दिख चुकी है ,..जूनून यदि सात्विक हो तो सच्चे परिणाम ही मिलेंगे ,...मोमबत्ती और एसएमएस वाली जनता का नेतृत्व करना अलग बात है ,....भ्रष्टाचार पर लड़ाई लड़ना अलग है ,...और हर दिल में देशभक्ति भरना थोड़ा अलग है ,....अपरोक्ष रूप से वो अभी कांग्रेस का साथ ही देंगे ,....उसके विकल्प के रूप में अमेरिका को भी कोई साथी चाहिए ,....शेष उत्तर समय ही देगा !...सबकी आशाएं फलीभूत हों यही कामना है ,...अच्छी पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

धन्यवाद राजेश तुमने अरविन्द केजरीवाल के जूनून को समझा और मैं तो यही राय दूंगा ऐसा टीम तुम झारखण्ड के हजारीबाग में भी गठीत करो युवाओं को अपने साथ जोड़ो आज हर प्रदेश में हर शाहर हर गाँव के युवाओं को अरविन्द केजरीवाल से जुड़ना चाहिए और उनके हाथों को मजबूती प्रदान करनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका छेड़ा गया यह आन्दोलन देश ब्यापी बने और लगातार चलता रहे ताकि आज अपने को चुना गया सांसद कहने वाले नेता जो जनता के मालिक बनकर जनता का ही खून चूस रहे हैं उनको सबक सिखाया जा सके अतः हर हाल में संगठन को मजबूत बनाना है और इस लडाई को २०१४ के लोक सभा चुनाव के पहले इतना सशक्त बना देना है की कांग्रेस या और भी बिपक्छी पार्टियों के नता जो लूट में चोर चोर मौसेरे भाई का खेल खेल रहें हैं वे औंधे मुह गिरे और देश की राजनीती से उनका नामोनिशान मिट जाये कुछ सच्चे इमानदार और नए युवा लोग आयें और इस देश की तस्वीर बदलें . एक बहुत अच्छा लेख लिखने को बधाई जरुर इसे जागरण में छापना चाहिए

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गठबंधनों में बिखराव तो चुनाव के दरमियान होते ही रहता है. एक दुसरे को तोड़ने का खेल कोई नई बात नहीं है. अगर सभी दलों के इमानदार लोगों की टूट से नई राजनैतिक समीकरण बनेगी, तो वो दल मजबूत होगी, जनता के मुड-मिजाज के अनुरूप भ्रष्टाचारियों से लड़ने वाले दलों की स्थिति मजबूत रहेगी. 2014 का चुनाव अन्य चुनाव की तरह ही होगा, अगर भ्रष्टाचारियों से लड़ने वालों की जमात नहीं बनती है. अन्य चुनावों की अपेक्षा इस चुनाव में भ्रष्टाचार चरम पर होगा. चूकी कई तरह के काले धन पार्टियों के पास उपलब्ध है. नित-नए घोटाले खुल-खुल कर सामने आ रहे हैं, कुछ ऐसे भी घोटाले हैं, जिसमें विपक्ष भी शामिल है, और वह जनता के जानकारी से दूर है, ये सारे घोटालों के धन पानी की तरह चुनाव में बहेगा तब भी मजबूत लोकतंत्र की दुहाई दी जाती है ! हम बड़े गर्व से कहते नहीं थकते की हमारे यहाँ लोकतंत्र है ! बढ़िया लेख राजेश जी

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यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है की जिस हिंदी को 15 वर्षों में पुरे देश में राज-काज की भाषा बना देना था,आज आजादी के 66 वें साल में भी कही नहीं दिख रहा है. एक कमजोर इक्षा सकती वाला देश के रूप में भारत की छवि दिख रही है. भारतीय भाषाओँ की लड़ाई नहीं हुई और अंग्रेजी प्रतिष्ठित हो गई यह सोचने वाली बात है. हिंदी को जहाँ सम्मान मिलना था वहां हिंदी अपमानित हुआ है, इसके वावजूद हिंदी की विशेषता ने इसे मरने नहीं दिया है, बल्कि और मजबूत बनाया है. आज कम्प्युटर में भी हिंदी किसी से काम नहीं है. भले संविधान ने हिंदी को सम्मान नहीं दिया पर आम-जन ने हिंदी का बिंदी लगा कर हिंदी को गौरवान्तित किया है. आज हिंदी बोलने वालों की संख्या अन्य समृद्ध भाषाओँ से किसी भी रूप में कम नहीं हैं.

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राजेश बहुत अच्छा लेख बधाई , वैसे मेरी राय में सरकार या संविधान हिंदी को मान्यता दे पाया या नहीं ? इस प्रश्न का जवाब तो देश को मिल चुका है और वह हमारे देश के विद्वानों नेताओं की अपनी मातृभासा के पार्टी कितना प्रेम और आदर है यह दिखलाता है , पर इन सबके बावजूद हिंदी हिन् ज्यादा प्रचलित भासा अपने देश की है और इस सत्य को अब दक्छिन भारत के लोग भी मानने लगे हैं खासकर केन्द्रीय विद्यालय का पूरे देश में एक ही सिलेबस होना इसमें काफी काम किया है अब तो टेलीविजन पर हिंदी खबर पढने वाले भी दक्छिन भारत के लोग दिखाई देने लगे हैं सरकारी कम काज भले अंग्रेजी में हो रहा हो पर बोलचाल की बहस तो आज हिंदी ही बनके उभरी है दरअसल इसके लिए राजनितिक इक्छ्शक्ति की जरुरत है और उसकी तरफ आज किसी का धयन नहीं जा रहा है बस केवल हिंदी दिवस एक औपचारिकता के रूप में मन दिया जाता है और सरकारी कार्यालयों में लिख दिया जाता है इस कार्यालय में हिंदी में काम करने की पूरी छूट है इससे हिंदी कोई मजबूती मिलेगी यह तो सभी समझ सकते हैं .

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देश में जब-जब आरक्षण की बात होती है कम पढ़े लिखे लोग उबल जाते हैं, उन्हें अपने अभाव-ग्रस्त जीवन में डर पैदा हो जाता. भविष्य उन्हें अंधकार मय दिखने लगता है. उन्हें लगता हैं कि बच्चों को रोजगार नहीं मिलेगा. नौजवान बेरोजगारों को लगता है कि उनकी पढाई-लिखी बेकार हो गई, और वे आरक्षण के विरोध में सड़क पर उतर जाते हैं. जिन्हें आरक्षण का लाभ मिला होता है उन्हें ये अपना विरोधी मानने लगते हैं. आरक्षण जिन्हें मिला होता है, वे आरक्षण विरोधियों को अपना दुश्मन मानने लगते हैं. राजनीतिज्ञों को इस लड़ाई में सत्ता का लाभ मिलता है. और देश प्रगति के रास्ते से भटक जाता है. बिलकुल ! श्री राजेश जी ! आपकी बातों से सहमत हूँ ! आपको और विस्तृत लिखना चाहिए थे किन्तु jitna लिखा बिलकुल स्पष्ट और सार्थक

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हम अपने युवा पीढ़ी का दमन नहीं कर रहे हैं. चूकि हर युवा पीढ़ी समझती है की उसे जीतनी आजादी चाहिए उतना नहीं मिल रहा है, उम्र के पड़ाव पर जा कर वह पीछे मुड़ कर देखता है तो उसे ख़ुशी होती है कि उसने समाज के डर से जो भी किया वह सुखद है. भारतीय समाज को रूढीवादी नहीं कहा जा सकता है, क्योकि इतिहास साक्षी है की इस समाज ने समय समय पर क्रन्तिकारी बदलाव किया है. सती प्रथा का ख़त्म होना बाल विवाह ख़त्म होना,विधवाओं के प्रति नजरिया में बदलाव, लड़का, लड़की में भेद-भाव जैसी कुरीतियों पर भारतीय समाज का नजरिया बदला है. स्पष्ट और सार्थक लेख दिया है राजेश जी आपने ! लेकिन एक बात कहना चाहता हूँ - ये मानव की प्रवृति होती है की वो बदलाव चाहता है और इस बदलाव में अनचाहा भी स्वीकार कर लेता है ! बढ़िया लेख

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बेनी जी की उलट खोपड़ी में ये बात भले ही हो की महंगाई बढ़ने से किसानों को फायदा होगा, लेकिन किसानों के बीच में अगर थोडा भी सम्बन्ध जिसे होगा, वह जनता है, कि व्यवसाई अपना महंगाई भत्ता स्वयं निकल लेते हैं, नौकरी पेशा को सरकार दे देती है, और विवश और लाचार रह जाते हैं तो किसान और मजदुर. बेनी जी का व्यान लालू जी के व्यान की तरह है. लालू जी ने बाढ़ से त्रस्त लोगों के लिए कहा था कि बाढ़ आने से बहुत आनंद आता है. बाढ़ में तरह तरह कि मछलियाँ खाने को मिलती है. सत्ता-वर्ग अपने अवगुण को भी स्वीकार करने कि स्थिति में नहीं होता है.अपनी अक्षमता को कुतर्कों से प्रमाणित करना चाहता है कि अक्षमता नहीं यह क्षमता है. बेनी जी का यह व्यान किसान-मजदूरों का मजाक है. सत्ता की अक्षमता का अहम् स्वीकारोक्ति है. श्री राजेश दुबे जी , सादर नमस्कार ! आपने इतना कुछ कह दिया है अपने लेख में की हमारे कहने लायक कुछ छोड़ा ही नहीं ! सहमत हूँ आपके विचारों से

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----आन्दोलन का मतलब जनता का आन्दोलन है, न कि बाबा रामदेव जी, या अन्ना जी का.----- यही सत्य है साहब । लेकिन अब तो केजरीवाल भी बोल रहा है ये केजरी आंदोलन है । ठिक है उस के पास जनसमर्थन की गाडी है, नैतिकता का पेट्रोल भी है, लेकिन सडक कहां ? राष्ट्रव्यापी सडकें दो सालमें नही बनती । ऐसे ही अकेला चल पडा । भाजप की तैयार सडक मिल सकती थी । लेकिन उसे उखाड दिया । काले को काला कहने से कोइ फरक नही पडेगा । काले के काले मतदार उस के कबजे में ही है । कम काले को पूरा काला बना दिया केजरी ने । तो दोगले हिन्दु को बडे काले की तरफ खिंचने का प्रयास ही किया । केजरी की हैसियत नही की अपने दम पर सरकार बना ले । राष्ट्रवादी हिन्दु वोट देनेसे रहे । लोकपाल के विरोधी दलित भी उसे वोट नही करेंगे । दलितों को बताया गया है की सरकारी नौकरी दलितों को ही करनी है । लोकपाल का बूरा असर उन पर ही पडेगा । लाख कोशीश के बाद मुस्लीम भी नही आयेंगे । किस के बलपर कुद रहा है ? बडे काले को ही सपोर्ट दे देगा धर्मनिर्पेक्षता का कारण बता कर ।

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राजेश एक अच्छा लेख- शायद बेनी प्रसाद वर्मा जैसे मंत्री इन बातों को पढ़े तब उन्हें अपने द्वारा दिए गए बयां पर शर्मिंदगी आये पर अफ़सोस इन सब समस्यायों से हमारे नेता अनजान बने किसानो के महंगाई रुपी घाव पर मरहम लगाने के बजाये नमक छिड़कने का ही काम कर रहें हैं भगवान करे इन भ्रष्ट और जनविरोधी नेताओं को गरीब किसानो की आह लगे और ये भी गंभीर संकट में घिरें तभी जाकर इनको सच्चाई समझ में आएगी जो नेता और प्रशासनिक अधिकारी खेत की मेढ़ तक को देखा न हो, दुर्भाग्य से वही किसानो के लिए योजनायें बनाता है दिल्ली के वातानुकूलित दफ्तरों से, किसान को खाद और बीज कैसे और कब मुहैया कराया जाये किसानो की मदद कब और कैसे की जाये? यह सब खेती से अनजान लोग ही आज तय कर रहें हैं और ऐसे बयां दे रहे हैं की अनाज का दाम बढ़ने से किसानो का बहुत फ़ायदा हो रहा है और आत्महत्या के आंकड़े गिनाते और भुनाते रहते हैं . -एक सचाई बयां करता हुवा अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई

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प्रिय राजेश जी आपने सही सवाल उठाये हैं, हमारे देश को अच्छे ईमानदार नेतृत्त्व हमेशा ही कमी रही है अन्यथा देश आज जहाँ दोराहे पर भटक रहा है (राजनितिक लोगो के साथ जाय की समाजसेवियों के साथ कदम मिलाये) सभी तरफ से भ्रमित हैं कोई भी सक्षम विकल्प देने में समर्थ नहीं है इसी लिए सत्ताधारी को मनमानी करने में सफलता मिलती है अगर विपक्ष अपनी भूमिका सही ढंग से निभाये तो फिर किसी भी योगी या समाजसेवी को राजनीती में आने की क्या आवश्यकता है और यही कारण भी है की कोई सा भी समाज सेवा या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन हो राजनितिक दल अपनी अपनी हांड़ी भी उसी आंच पर सेंकने के लिए बिना मांगे समर्थन रूपी इंधन दे देते हैं. या फिर आन्दोलन कारी ही द्वारे द्वारे जाकर समर्थन मांगते नजर आते है जैसा की काले धन के विरुद्ध आन्दोलन के समर्थन मांगने के लिए बाबा जी बारी बारी से सभी राजनितिक दलों की चौखट पर माथा टेकने गए और उन्होंने समर्थन भी दिया इस लिए ही वर्तमान दोनों आंदलन ही राजनीती की भेट चढ़ गए लेकिन जनता क्या करे वह तो ठगी गई हाँ यह बात अवश्य हो सकती है की इतने ड्रामे के बाद २०१४ में होने वाले चुनाव में वर्तमान पार्टी की सत्ता से बिदाई हो जाय लेकिन क्या कोई गारंटी ले सकता है की जिस किसी भी पार्टी/संघटन को सत्ता मिलेगी वह इमानदार साबित होगा कोई नहीं कह सकता क्योंकि जनता यह सब भी देख रही ही की उसे किस प्रकार से ठगा जा रहा है ?

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आदरणीय राजेश जी, इसमें कोई संदेह नहीं है कि रामदेव जी का आन्दोलन व्यक्ति केन्द्रित आन्दोलन है। अब तो यह भी विदित हो गया है कि रामदेव जी की राजनैतिक महात्वाकांक्षा है। तभी तो वह भ्रष्टाचारी नेताओं के संपर्क में हैं और किसी भी भ्रष्टाचारी की आलोनचना करना अनुचित समझते हैं। सत्ता के लिये वे राहुल को भाई और सोनिया जी को राजमाता बना देते हैं। 420 को शहीदों की श्रेणी में रख देते हैं। इनका आन्दोलन पारदर्शी भी नहीं है। इनके आकड़े अतिश्योक्ति पूर्ण हैं। इनके बयान केवल सनसनी फैलाने के लिये होते हैं। जैसे कि एक बार इन्होने कहा था कि उत्तराखंड के एक मुख्य मंत्री ने इनसे रिश्वत माँगी थी, लेकिन उसका नाम आज तक नहीं बताया।यह दावे भी ऐसे ऐसे कर देते हैं जो ईश्वर के लिये भी असंभव होते हैं। खैर बाबा की लीला बाबा जाने। हम तो भाई बाबा की बात न माने। http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/08/07/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8B-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

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राजेश जी नमस्कार, पाकिस्तान से संबंधों को अक्सर क्रिकेट से ही क्यों जोड़ा जाता है? क्या सिर्फ क्रिकेट खेलने तक ही हमारे आपसी सम्बन्ध है? क्यों कभी अन्य व्यापारिक गतिविधियों को भी रोकने की बात नहीं करते? क्या सारा आतंकवाद क्रिकेटरों ने ही फैला रखा है? हम सिर्फ भ्रम में ही जी रहे हैं. खेलों से आतंकवाद नहीं मित्रता बढाती है. यदि आतंकवाद के खिलाफ चुनौती देना है तो सारे व्यापार सम्बन्ध ख़त्म करने होंगे. अन्य देशों से पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता बंद करवाने की लड़ाई लड़नी होगी. महज खेलों और खासकर क्रिकेट के वक्त दुश्मनी को याद करने से कुछ हासिल नहीं है. लड़ाई की रणनीति का पहला उसूल है सेना की रसदपूर्ति के मार्ग को बंद करना. जो हम नहीं कर रहे हैं और सिर्फ क्रिकेट तक ही आपसी संबंधो को मानकर विरोध कर रहे हैं जो कुछ ठीक नहीं है.

के द्वारा: akraktale akraktale

मनमोहन सिंह देशद्रोही है और सभी पार्टियाँ भी....... कोई डिग्री ले लेने से ही विद्वान या इमानदार नहीं बन जाता......दोष हमारी शिक्षा व्यवस्था का है कि डिग्री उन्ही लोगों को मिलती है जो अज्ञानी और घुसखोर हैं......हो सकता है आप पांच ऐसे इन्सान दिखा दें जो वास्तविक में ज्ञानी और इमानदार हैं और उनके पास डिग्री भी है पर मैं 95 ऐसे इन्सान दिखा दूंगा जो न ज्ञानी है न इमानदार पर उनके पास डिग्री है और बड़ा पद भी.........अंग्रेजों ने हमें जो दान में आजादी दी है वो इसलिए दी है की उनके प्रिय सेवक हमारे देश में अनुचित ढंग से राज कर सकें और हम इतने मुर्ख भी बने रहें है कि आज तक उनके हाथों में ही अपना देश दे रखा है और परिणाम आज भारत कि ऐसी दुर्दशा है.........जहाँ भूख है तनाव है भय है........हमने गाँधी जी का बन्दर बनने कि आड़ में अपने क्रांतिकारियों के बलिदान को व्यर्थ किया है.........हम अपनी संस्कृति को भूल गए हैं........किन्तु सभी देशद्रोहियों का अंत निकट है.......

के द्वारा: pritish1 pritish1

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

. . अभी देश को विदेशों के मुकाबले मजबूत बनाने की जरुरत है.एक छोटा सा देश पाकिस्तान जब चाहता है, हमें तंग कर देता है. चीन के ताकत के सामने हम फीके पद जाते हैं. अभी हमारे देश की प्राथमिकता, गरीबी मिटाने के लिए होनी चाहिए. भुखमरी ख़त्म करने का होना चाहिए. कुपोषण से बच्चे त्रस्त हैं उनके लिए सुपोषण की योजना होना चाहिए. भूख, भय, और भ्रष्टाचार ख़त्म करने की दिशा में हमारी सोंच कैसे बदले इस तरह के कार्य-क्रम को ले कर हम आगे बढे, तो देश का कल्याण होगा. अपनी संस्कृति को नष्ट कर पश्चिम की संस्कृति हमें बर्बाद कर देगी. हम कही के नहीं रहेंगे. आदरणीय राजेश जी, नमस्कार! आपके विचार आम आदमी के विचार हैं पर, जो खास हैं उनको तो कुछ ख़ास करते रहने चाहिए न? ... आम मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए बीच बीच में कुछ मुद्दों को उठा दिया जाता है. हमें हमारी सोच, हमारी संस्कृति कैसे बचाकर रखनी है यह हमारी चिंता का विषय है मैं सभी विद्वानों से, बुद्धिमानों से आग्रह करता हूँ कि लेखन और बहस आम आदमी की समस्यायों और उसके विकास के लिए होने चाहिए. ... इस सन्दर्भ में आमिर खान का प्रयास उपयुक्त समय में सही कदम कहा जायेगा.!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

राष्ट्रपति की गरिमा भारतीय लोकतंत्र में सर्व विदित है. लोगों की अपेक्षा रहती है कि राष्ट्रपति का पद ऐसे व्यक्ति को सौपा जाय जो भारतीय जनता के हितों के प्रति समर्पित हो प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति होने की योग्यता ( रबर स्टाम्प) रखते है. आपके विश्लेषण और जानकारी को नमन. राष्ट्रपति की शक्तियां सीमित होती है, इसके वावजूद इस पद की गरिमा सर्वोच्च है ये बात ऊपर से देखने में तो सच हैं पर अंदर की सच्चाई कुछ और हैं क्योकि यही सच्चाई समझने के बाद माननीय कलाम साहब ने इस पद को दोबारा लेने से ठुकरा दिया क्योकि यदि इस पद पर रह कर देश के लिए कोई अच्छा काम या कुछ अच्छा करने कि गुंजाइश होती तो आदरणीय अब्दुल कलाम साहब इस पद को स्वीकार करने से कत्तई गुरेज़ न करते.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

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सरकार जो जनता के तकलीफों से अनजान बनी हुयी है और अपने मुह मिया मिठ्ठू बन रही है उसके होने नहीं होने का जनता को क्या मतलब और अपना संविधान तो विचित्र है जिसमे प्रावधान है की चुनी हुयी सरकार जनता का गला काटे उन्हें भूखों रहने पर मजबूर करे और गेहूं जो खाने की वस्तु है उसे सड़ने को छोड़ दे और फिर भी सरकार चलती रहे तब तो इसे सरकार का नहीं जनता का दोष ही कहा जायेगा अगर भूख है समाज में तो एक खूनी आन्दोलन की जरुरत है केवल बंद करने और बसों को जलाने, दुकानों को बंद करने सरकारी सम्पति को नुकसान पहुचने को ही विरोध प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता एक ऐसा आन्दोलन हो की नेत्रित्व में परिवर्तन हो तब जाकर यह सरकार कुछ समझेगी पर लगता नहीं इस देश में अब कोई क्रांति आएगी जो सन ७४ में लोकनायक जयप्रकाश लेकर आये थे एक ऐसे क्रांति की इस देश को तत्काल जरुरत है एक अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई और फीचर ब्लाग कहलाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहूँगा

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

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राजेश  जी समझ  नहीं आ   रहा कि यह सरकार कौन चला रहा है, मनमोहन जी तो कतई नहीं चला रहें हैं। लगता है कि इस  सरकार में कई प्रधानमंत्री हैं। कुछ  तो सरकार में बैठे हैं और कुछ  सरकार के बाहर। यह बम्ब जनता पर जरूर फैका गया है, लेकिन इसका परिणाम सरकार का अंत  हैं।  मुलायम जी और ममता जी की दोहरी नीति समझ  में नहीं आती। सरकार का विरोध  करेंगे, लेकिन  समर्थन  करते हुये। मुलायम  जी का तो चलो फिर  भी मान लेंगे किशायद सरकार सीबीई का डर  दिखाकर कुछ  भी करवा और कहलवा लेगी। लेकिन ममता के बारे में नहीं समझ  पाता। जनता को बेवकूफ  समझ  रखा है इन्होंने। तार्किक  ढंग  से लिखे आलेख  के लिये बधाई......

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भी नोरी मुंडू नामक झारखण्ड की महिला खिलाडी जो एयर इंडिया की महिला हॉकी टीम में अनुबंध के आधार पर खेलती थी, इस आशा से कि उसे स्थाई नौकरी मिल जाएगी, लेकिन नौकरी उसे नहीं मिली. नोरी, एयर इंडिया के लिए 2006 तक खेलीं, लेकिन टीम के बिघटन के बाद उसे उतना भी धन उपलब्ध नहीं हो सका कि नोरी कोई सम्मान पूर्वक कार्य कर अपनी गरीबी से लड़ सके. नोरी अब अपने गावं में शराब बेचने का काम कर रही है. झारखण्ड में आदिवासियों को शराब बनाने हेतु क़ानूनी छुट है. राष्ट्रिय स्तर पर अपनी खेल से लोहा मनवाने वाली लड़की को एक चपरासी की नौकरी भी नसीब नहीं हुई. श्री राजेश जी नमस्कार ! आपने आगे लिखा है की क्रिकेट को इतना शिखर पर चढ़ा दिया गया है ! सही बात है एक तरफ राष्टीय खेल खेलने वालों का या हाल और दूसरी तरफ क्रिकेट खेलने वालों के बारे न्यारे ! वो करोडो बना रहे हैं ! बढ़िया लेखन

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खेल मंत्रालय अगर वास्तव में आस्तित्व में है तो उसे निशा रानी जैसे खिलाडियों के बारें में पता होना चाहिए, न कि मिडिया में आये ख़बरों से उसे जानकारी मिलनी चाहिए. आदरणीय राजेश जी ..... सादर अभिवादन ! हमारे देश में शिक्षा और खेलों पर बजट का न्यूनतम हिस्सा खर्च किया जाता है ..... बिना कुछ किये धरे हम कैसे यह आशा करते है की ओलम्पिक में हमारे खिलाड़ी पदकों के ढेर लगा दे खिलाडियों को खुराक +सुविधा और प्रयोजक तक नही मिल पाते फिर भी जो कुछ मिलता है उसको पर्याप्त कहा जाना चाहिए क्योंकि पांच साल हम बिलकुल भी ध्यान नही देते लेकिन ओलम्पिक के दिनों में दूसरे देश के खिलाड़ियो को कमाल करते हुए देख यह आशा करते है की हमारे फिस्सडी खिलाड़ी उनसे मुकाबला करे और सारे पदक हमारी झोली में ही आये ..... हर बार इस बात से संतोष करना पड़ता है की पिछली बार के मुकाबले हम इस बार कितने अच्छे है या फिर पाकिस्तान के मुकाबले कितने बेहतर है और एक बार तो हद ही हो गई थी जबकि पुरे एशिया (इस बैल्ट ) को सिर्फ एक ही पदक ही मिल पाया था .... तब हमारा मिडिया देश की सीमाओं से ऊपर उठ पाया था ....

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राजेश  जी मेरा मानना है कि बाबा रामदेव, अरविन्द  केचरीवाल  तथा मनीष  शिशोदिया  आदि ने जो भी कहा है उससे संसद गरिमा बढ़ती है। बाबा रामदेव ने तो वह  सच  बताया जो ये सांसद नहीं जानते अपने बारे में कि वह चोर हैं, लुटेरे हैं, हत्यारे हैं, बलात्कारी है आदि। अरे भाई यदि कोई हमारी कमी बताता है तो वह तो हमारा उद्धार  करता है। शैलेष जी को तो बाबा रामदेव को विशेषाधिकार नोटिस की जगह  धन्यवाद  पत्र देना चाहिये। लेकिन  क्या करें बेचारे शैलेष  जी। शायद उन्हे लगता है कि बाबा ने जनता को उनके गुणों से अवगत  करा दिया  है। जन जागृति लाने वाले आलेख  के लिये बधाई  एवं आभार......

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समय और परिस्थितिया बदल रही हैं. विकाश के साथ-साथ लड़का, लड़की का भेद भी मिट रहा है. सामाजिक विकृतियाँ, जिनके चलते लड़की को बोझ समझा जाता हैं, ख़त्म हो रहा है. आज बेटियों के बदौलत बाप का सम्मान भी बढ़ने लगा है. कई क्षेत्र में बेटियां बेटों से आगे हैं. जिस बाप को कभी बेटों से गौरव प्राप्त होता था, आज स्पस्ट दिख रहा है कि बेटियां भी उस जगह को प्राप्त कर बाप का गौरव बढाती हैं. भारतीय मानसिकता में बदलाव आया है. जिस कार्य को कभी सिर्फ लड़के करते थे, आज वह लड़कियां भी दिख रही हैं. यह देश के लिए शुभ संकेत है. यह इस बात को इंगित करता है कि लड़की अब बोझ नहीं समझी जाएँगी. पहले लड़कियों को सुरक्षा दिया जाता था, अब लड़कियां ही सुरक्षा दे रही है. अब लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं, वल्कि ज्यादा ही जीनियस हैं. बहुत सटीक और विस्तृत लेखन , श्री राजेश जी ! बेटियां हमारा कल हैं ! उनसे ही दुनिया का अस्तित्व है ! बढ़िया लेख !

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सेना के सर्वोच्च अधिकारी जेनरल विकेसिंह के खुलासे से देश की जनता को भी दलालों द्वारा रक्छा खरीद में बड़े पैमाने पर घोटाले का पता चला है और यह बहुत शर्मनाक और दुखद बात है एक तरफ तो सेना में कार्यरत जवान इतनी विषम परिस्थितियों में सीमा पर चौबीसों घंटे सीमा की चौकीदारी करते हैं और दूसरी तरफ हमरे नेता गन, हमारे रक्छा मंत्री जेनरल को ही मुकदमो के घेरे में लेने की तय्यारी कर रहे है जो सवाल उन्होंने उठाये हैं उन पर कारगर कदम उठाने के बजाय जेनरल को ही बदनाम करने का काम आज मंत्री और नेता कर रहे हैं कयियो ने तो जेनरल को ही बर्खास्त करने की बात कर डाली क्यूँ रक्छा मंत्री बर्खास्त नहीं किये जाते? जब उनको सारी बातों का पता था फिर भी वे इसपर गंभीरता न दिखाते हुए मामले को और उलझाया और तूल पकड़ने दिया क्या यह देशहित में है ? धीरे धीरे यह सरकार एवं इसमें शामिल नेता एवं मंत्री या तो घोटाले करते पाए जा रहे हैं या सेना जैसे महत्वपूर्णऔर अनुशासित महकमे को बदनाम करने का काम कर रहे हैं इससे सेना में कार्यरत जवानो का भी मनोबल गिरता है जो एक घातक बात है, देश की सुरक्छा को लेकर जरुर सरकार को जल्द से जल्द रुके पड़े सौदों को खरीद के लिए पहल करना चाहिए इसीमे देश की भलाई है

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अन्ना की टीम द्वारा नेताओं को डकैत एवं भ्रष्ट कहने से बहुत सारे नेता एकठे होकर मानहानि का दावा पेश कर दिए लेकिन कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने कहा! बाबा रामदेव को पत्थर से बांध कर नदी में डाल देना चाहिए तब किसी नेता ने इसका विरोध नहीं किया क्या नेताओं को अभद्र भाषा बोलने की छूट है? वे जिसको जो चाहे कह सकते है और एक सामाजिक कार्यकर्त्ता जो देश की जनता की समस्यायों के लिए लड़ रहा है और उसकी कोई पार्टी या नेता सुन नहीं रहा ऐसे में कोई भी बौखला कर चोर को चोर और भ्रष्ट को भ्रष्ट कहेगा ही चाहे इनको कितनी मिर्ची क्यूँ न लगे इस देश की जनता ने देखा जब एक सशक्त जन्लोक्पल बिल पास करने की बारी आई तो कैसे सभी पार्टियों के नेताओं ने तरह तरह के बयां बाजी कर इसे पास नहीं होने दिया और कहते है कानून संसद में बनते और पास होते हैं जिस देश की संसद में नेता अश्लील विडियो देखते पकडे जाते हैं वही अपने को सच्चा और इमानदार कहलाना चाहते है , जरुर टीम अन्ना के बयां में सचाई है और इसका पता आनेवाले ३ जून को सरकार को चल जायेगा और आन्दोलन कमजोर बिलकुल हुवा नहीं है यह दिनोदिन मजबूत हो रहा है राजेश आपने अच्छा लिखा है

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श्री राजेश जी , सादर नमस्कार ! भारत की सेना या उससे जुड़े मुद्दों पर कुछ भी लिखना मुश्किल होता है ! फिर भी बहुत सही बात कही है आपने रक्षा बजट पर इतना पैसा खर्च किया जाता है तो आखिर वह जाता कहाँ है. चिंतनीय बात है और जो बातें उभर कर आयी हैं वह जनमानस के माथे पर चिंता की लकीरें उकेर रही हैं. जो भी दोषी हो उसे सजा अवश्य ही मिलनी चाहिए ! आपकी बात से पूर्ण सहमती दिखाते हुए लिखना चाहता हूँ की आपने सही कहा है,आवश्यकता है,अपनी कमियां दूर करने कि न कि विवादों में उलझकर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति की..विश्व को और विशेषतः शत्रुओं को मज़बूत किया जा रहा है इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है.बहुत सही विषय लिया है आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वैसे तो मैं मूलतः कवि नहीं हूँ, किन्तु जागरण जंक्शन के कुछ कवियों से प्रेरित हो कर कविता लिखने का प्रथम प्रयास कर रहा हूँ, कविता अगर पसंद आए तो खुले दिल से मेरी सराहना कीजिएगा ताकि मैं और भी ऐसी खूबसूरत कविताएँ लिखने के लिए प्रेरित हो सकूँ……….आपका Wise Man ! ऊपर आम का छतनार, नीचे हरे घास हज़ार, और वन-तुलसी की लताएँ करने गलबहियाँ तैयार, लेके चाकू और कटार, जब हो ओलो का प्रहार, बिमला मौसी का परिवार, चुने टोकरी मे अमियाँ फिर डाले उनका आचार… यह खेल चले दो तीन महीने लगातार…. फिर आए जाड़े का मौसम, पड़े शीत की मार, छोटू को हो जाए बुखार….. डॉक्टर की दवाई फिर करे छोटू का उद्धार….. फिर आए गर्मी की ललकार, सर्वत्र मचे हाहाकार, और जब लाइट न हो और हो पंखे की दरकार, मचाए सब चीख-पुकार, चले प्रक्रिया यह बारंबार, फिर आए बसंती बहार, इस मौसम के बारे में मैं कहूँगा अगली बार…… तब तक के लिए मेरा सादर नमस्कार….

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

राजेशजी आपके द्वारा बताये गए संभावित मुख्यमंत्री यूपी में मन्न्नीय मुलायम सिंह को ताज मिलना सुनिश्चित अपेक्छा लगती है पर मेरे विचार से इस बार का परिणाम जरुर चौकानेवाला होगा एक्जिट पोल के आधार पर तो आपकी बात सही लगती है पर यूपी की जनता बीएसपी एवं एसपी दोनों पार्टियों को आजमाए हुए है अतः न कांग्रेस न ही बीजेपी और नहीं एसपी एवं बीएसपी किसी पार्टी को बहुमत मिलने के कम आसार हैं जरुर मेरी बात लीक से हटकर लगेगी लेकिन मतदाता इस बार भ्रष्ट एवं दागी नेताओं के खिलाफ जरुर गयी है और दागी एवं भ्रष्ट मिला जुलकर सभी पार्टियों में शामिल हैं पर देखा जायेगा कल परिणाम आनेवाले हैं अब कुछ घंटों का समय हीं बाकि रहा है सब कुछ जनता एवं देश के सामने आ जायेगा .

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के द्वारा: chandanrai chandanrai

आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला जैसा आया है ,यह अन्ना हजारे के आन्दोलन का ही असर है और सरकार और मंत्री जो कहते फिरते थे कानून सड़कों पर नहीं बनते संसद में बनते हैं कैसा कानून संसद में बनाया जो सरकार के मंत्री जेल में बंद हैं और करोड़ों का घोटाला सामने निकल रहा है आजकल तो छापों की भरमार है और हर छापे में करोड़ों अरबों का काला धन बरामद हो रहा है ताजा मामला यूपी के नोयडा इलाके का है श्री चढ़ा जो मायावती के खजांची हैं उनके यहाँ से करोड़ों की दौलत नोयडा के एक माल में बरामद हुवा है यह सब भ्रस्ताचार के जीते जागते सबूत हैं और आज की तारीख में कोई पार्टी या नेता शायद हीं इन सब आरोपों से अपने को बचा सकता है अभी तो जाँच अजेसी पूरी ताकत से अपना काम कर हीं नहीं पा रही है क्यूंकि वह सरकार के दवाब में काम करती है इसीलिए अन्ना हजारे के जन्लोक्पल बिल में सीबीआई को स्वतन्त्र करने की बात कही गयी है जब तक यह स्वतन्त्र अजेंसी नहीं बनती इस देश की जनता को न्याय नहीं मिल सकता हम सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद कहते हैं जिन्होंने इस सरकार की पोल खोली है और अच्छे अवसर पर खोली है जब युपी में चुनाव होने जा रहा है अब जनता को सोंचना है की जिस पार्टी की सर्कार ने अन्ना हजारे के शांतिपूर्ण आन्दोलन को कुचलने की कोशिश की क्या उनको फिर चुनना जनता चाहेगी? अन्ना हजारे को प्रमाण से ज्याद दावा की खुराक और इंजेक्सन लगा कर और बीमार करने का काम भी इसी सरकार के इशारे पर हुवा है और उस डाक्टर को सम्मान दिया गया है क्या अब भी इस देश की जनता इस कान्ग्रेस को चुनेगी इन्होने तो ब्यापारियों को भी ठगा जिनसे ये पैसा खाते रहे और देश को तो ठगा हीं है अब वक्त आ गया है विपक्छी पार्टियाँ एकजुट होकर इस सरकार को उखाड़ फेके और दोषियों को जेल की हवा खानी पड़े अब मध्यावधि चुनाव होने के आसार नजर आ रहें हैं अच्छा होता यह सर्कार जल्दी अपना बोरिया बिस्तर बाँधती और नए रूप से चुनाव कर नए लोग आते और इस देश की जनता को एक जवाबदेह सरकार मिलता

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मैं आपके विचार से शत प्रतिशत सहमत हूँ आज इस देश की जनता का हाल वैसा हीं हो गया है जैसा आपने लिखा है क्यूंकि अगर किसी जवान या अधेड़ ब्यक्ति के मन में समाज सेवा की भावना जगे भी तो लोग उसे शक की निगाह से हीं देखने लगे हैं, क्यूंकि जनता को नेताओं और मंत्रियों ने इतना ठगा है की अब जनता किसी पर विश्वास करना भूल सी गयी है और इस देश की जनता को जैसे थे, वैसे रहने की आदत हो गयी है किसी को विकास की पड़ी नहीं है और केवल और केवल अपना स्वार्थ अगर सिद्ध होता हो तब ही लोग एक कदम आगे बढ़ाना चाहते हैं सामूहिक सोंच तो अब रहा हीं नहीं. तभी ये नेता चुनाव दर चुनाव जनता को चन्द रुपयों और शराब की बोतल पर उनका वोट खरीद रहें हैं हाँ इतना चुनाव आयोग ने जरुर किया है की बूथ केप्चरिंग की खबर सुनने में नहीं आती पर बाहुबली अभी भी धनबल और मसल पावर का इस्तेमाल चुनावों में करते हैं और चुनाव जीतकर इस देश की जनता के लिए कानून बनाते हैं जो कानून गरीबों को सताती है और अमीरों को और अमीर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है हम किसी को धोखेबाज कहना तर्कसंगत नहीं समझते अगुआ बनना हीं अब विरले सोंच बन गया है, अभी हमरे देश को एक मजबूत लोकतंत्र बन्ने में बहुत समय लगेगा इस देश को एक नहीं हजारों अन्ना की जरुरत है जो जन जागरण का कम कर सकेगा . अशोक कुमार दुबे , द्वारका, नयी दिल्ली -७५

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राजेश जी नमस्कार, आपने सही कहा जागरूकता जरूरी है.शायद नेता और मतदाता दोनों के लिए. मगर हो क्या गया है की मतदाता पर नेता तंत्र पूरी तरह से हावी हो गया है जिस प्रकार नारियों के आपने कई आलेख पढ़े होंगे की यह समाज पुरुषप्रधान है और नारियों ने ये मान लिया की इन्ही के साए में हम सुरक्षित हैं बस नेता और मतदाता भी उसी कतार में आ गए हैं.जब कोई चुनौती ले कर आगे आ कर जाग्रत करना चाहता है तो उसे बहरूपिया और धोखेबाज कहा जाता है. फिर उसके सन्देश का कोई अर्थ ही कहाँ रह जाता है.मै कहता हूँ इन को धोखेबाज बताने वाले क्यों अपने हाथ में उनकी जवाबदारियाँ नहीं ले लेते. मतलब तो जनता के हित का है. कोई भी अगुआ हो क्या फर्क पड़ने वाला है.

के द्वारा: akraktale akraktale

उपाय बताने का यह तरीका भी ठीक नहीं ,अकरक तलेजी माना कुछ लोग अपने परिवार को ही दुःख में डाल देते हैं लेकिन इन सब का कारन भी असिक्छा और पिछड़ापन है कमी है, एक अनार और सौ बीमार वाली बात भी है देहातों में शराब की उपलभ्दाता भी एक सरकारी मुहीम हीं है जो पिछड़ों को और पिछड़ा और गरीबों को और गरीब किये जा रही है साथ अछे काम को बढ़ावा देनेवाला भी गाँव में बहुत कम लोग हैं कुछ हैं भी तो फालतू परेशानियों से अपने को दूर रखना चाहते हैं गाँव का विकास कैसे हो? किसको कहा जाये, जो मुखिया सरपंच जो लोग भी गाँव में गांववालों के बीच रहते हैं अब वे भी शोसन में शामिल हैं गाँव के स्कुल में उनका बच्चा भी नहीं पढता पास के शहर के स्कुल में जाता है फिर जो कुछ मुठ्ठी भर लोग गाँव में रह गए हैं उनको विकास से कोई मतलब नहीं कम से कम मेरे गाँव में तो ऐसा ही है अतः जो गाँव में आज रह रहें हैं उनको इसके लिए जागरूक करना आवश्यक है उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान हों और कर्तब्यों का पालन करना भी जरुरी है आज हम अधिकारों के प्रति जितना सजग हुए हैं उतना कर्तब्यों के प्रति नहीं यह भी एक सोंच का विषय है .जब तक हम हमरे लिए क्या अच्चा और क्या बुरा यही नहीं तय कर पाएंगे तो विकास की कोई योजना हमारे किसी काम की नहीं और बुरायिओं का विरोध करना सामूहिक रूप से जरुरी है तभी हम अपने लिए कुछ अच्छा सोंच सकते हैं

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के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5