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कार्यकर्ताओं की उपेक्षा

Posted On: 23 Mar, 2014 social issues में

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. पार्टियां जब व्यक्तिवादी हो जाती है, तब लोकतंत्र पर खतरा मडराने लगता है. भारतीय लोकतंत्र पर यह खतरा मडराने लगा है. राजनीति का ये व्यक्तिवादी होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है. इस बार के लोकसभा के चुनाव में सभी दलों ने कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया हैं. सभी दलों में ऊपर से टपके हुए लोगों को चुनावी टिकट मिला है. नौकर शाह, फिल्मी सितारे, खिलाडी और दूसरे दल के नेता जो पार्टी में आने तक पार्टी के लिए विष-बाण छोड़ते थे, वैसे लोगों को सभी दलों ने प्रतिष्ठित किया है. बीजेपी ने तमाम पुराने कांग्रेसियों को टिकट दे कर, पता नहीं भारतीय राजनीति में कौन सा सन्देश देना चाहा है. इस चुनावी समर में आम आदमी को चुभने वाली बात ये है कि किसी भी दल ने कार्यकर्ताओं को तनिक भी नहीं पूछा है. कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के लिए जिम्मेवार चुनाव आयोग भी है. दल, बदल कानून में सख्ती के कारण सदन में अकेला सदस्य दल छोड़ कर नहीं जा सकता है. दल छोड़ने के लिए दो तिहाई सदस्यों की जरुरत होती है. जब एक भी सदस्य दल छोड़ सकते थे, तब राजनैतिक पार्टियां अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को ढूंढती थी. टिकट बटवारे के समय चिंतन किया जाता था कि कौन कार्यकर्त्ता किसी भी लोभ के आगे नहीं झुकेगा, किसी भी कीमत पर नहीं बिकेगा. वैसे समर्पित कार्य-कर्ताओं को चुनाव लड़ाया जाता था.
. डाक्टर लोहिया ने किसी भी पार्टी के लिए कोष, कार्यालय, कार्यकर्त्ता और कार्यक्रम को जरुरी समझा था. लोहिया जी कार्यकर्ताओं को सामाजिक ज्ञान और पार्टी की नीति सिद्धांत को समझने के लिए, प्रशिक्षण शिविर का आयोजन करते थे. ये प्रशिक्षण शिविर पखवारा यानि पन्दरह दिनों तक भी चलता था. एक साधारण कार्यकर्त्ता में भी, गाव और देश के बारे में समझने की व्यापक सूझ-बुझ होती थी. पर लोकतंत्र का विकाश का ढिढोरा पिटते-पिटते हम लोकतंत्र को खतरे में डालते गए. कार्यकर्त्ता नेता की आलोचना भी करते थे जो आज के दिन में सम्भव नहीं है. संगठन की मजबूती के लिए नेता आलोचना को सुनने की स्थिति में आज के दिन में नहीं रह गए हैं. संगठन को पारिवारिक बना दिया गया है. वंशवाद का अघोषित सिद्धांत सभी दलों में देखने को मिलता है. कार्यकर्त्ता से ज्यादा चाटुकारों की पूछ पार्टी में ज्यादा होने लगी है.
. लोकतंत्र की मजबूती के लिए पार्टी को सर्वोपरि मनाने की परम्परा ही ख़त्म हो गयी. लालू यादव अपनी बेटी मिशा भारती के लिए राम कृपाल यादव को राजद से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया. राम कृपाल यादव को भाजपा ने पाटलिपुत्र से बिना देर किये लोकसभा का उम्मीदवार बना दिया.इस राम लीला को राजद और भाजपा के कार्यकर्त्ता भौचक देखते रह गए. रामबिलास पासवन अपने बेटे चिराग को लोक जनशक्ति पार्टी में तमाम वरीय नेताओं को दरकिनार करते हुए शीर्ष पद पर प्रतिष्ठित कर दिया और लोकसभा का उम्मीदवार भी बना दिया. इस तरह के उदहारण भारतीय राजनीति में सभी दलों और सभी राज्यों में है. अब ये जरुरी हो गया है, कि लोकतंत्र के मजबूती के लिए भी कुछ कम हो. चुनाव आयोग को अब दल-बदल नीति को पहले जैसा कर देना चाहिए. अब एक भी सदस्य पार्टी छोड़ कर जा सकें वैसी नीति को पुन: लागु कर देनी चाहिए. निश्चित ही इससे पार्टी के मठाधीस अपने पार्टी रूपी मठ को सलामत रखने के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं को पूछेंगे.



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 25, 2014

आदरणीय राजेश जी, सादर अभिवादन! अब तो सत्ता यानी कुर्सी के लिए कुछ भी करेंगे वाली नीति हो गयी है … कम से कम भाजपा से ऐसी उम्मीद न थी कि वह ऐसा करेगी …अब फैसला तो जनता को करना है …पार्टी को वोट देती है या उम्मीदवार को?

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 24, 2014

http://anandpravin.jagranjunction.com/2014/03/24/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9A-%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9A-2/ आपभी शामिल हों इस महामेला में………..सादर आपत्ति होने पर कृपया कमेन्ट डिलीट कर दें……

parwati के द्वारा
March 24, 2014

राजनीति में भाई-भतीजावाद अब चरम पर है.


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