avibyakti

अपनी तथा आप सबों की अभिव्यक्ति का आकांक्षी

178 Posts

999 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 3734 postid : 740722

जागरूकता की जरुरत है

Posted On: 14 May, 2014 social issues में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

. 16 वी लोकसभा की गठन की प्रक्रिया का मुख्य काम, मतदान संपन्न हो गया. चुनाव आयोग ने पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार 131 प्रतिशत ज्यादा खर्च करके चुनावी इतिहास में इस चुनाव को सबसे महंगा बना दिया. इस बार दलों और उम्मीदवारों के खर्चे को छोड़ कर सरकारी खजाने से 3426 करोड़ रूपये खर्च हुए. चुनाव आयोग ने खर्चे में वृद्धि के कारणों में एक महंगाई को भी बताया है. इस महंगाई के वजह से हर बार चुनावी खर्चे बढ़ जाते हैं. यह सिलसिला प्रथम लोकसभा के गठन से चल रहा है. हर बार हम बेशर्मी से महंगाई को भी एक कारण बता देते हैं. इसी महंगाई के कारण चुनाव आयोग ने प्रत्येक उम्मीदवार के खर्चे को 70 लाख तक बढ़ा दिया है और भारतीय जनता मूकदर्शक बन कर इस को स्वीकार और वर्दास्त कर रही है. क्या नए लोकसभा के गठन के बाद इस बेशर्मी पर चर्चा होनी चाहिए? या, चर्चा होगी?
. जनता की जागरूकता इस चुनाव में भी नहीं दिखा, धन और शराब का इस्तेमाल इस चुनाव में भी खुल कर हुआ है. जनता के होने वाले प्रतिनिधि इसके सूत्रधार हैं. स्पष्ट है कि चुनाव आयोग के अरबों खर्च के बाद भी जनता मत का मतलब नहीं जान सकी है. मतदान के लिए तो चुनाव आयोग ने मतदाताओं तक अभियान चलाया पर इसके महत्व से जनता को भरपूर अवगत नहीं कराया. अब मतदान से दान शब्द को हटा देना होगा. मतदाता आज तक अपने मत का दान कुछ इस तरह से करते आ रहे हैं जैसे तीर्थ स्थान पर भिखमंगों को कुछ सिक्के दे दिए जाते हैं. मत के दान का स्वरुप बदलना होगा. अच्छा होगा की मतदाताओं में जागरूकता का एक ईमानदार अभियान चलाया जाये और सिर्फ चुनाव के समय ही नहीं. सोलहवे लोकसभा के गठन तक भी मत का मतलब कुछ चंद रूपये, कुछ दिन की मस्ती के लिए शराब और किसी की गिड़गिड़ाहट है. इस तरह हम देखते हैं कि देश निर्माण हेतु , अच्छे सरकार के लिए और मजबूत राष्ट्र के लिए जनता मत नहीं दे पा रही है. जाति और धर्म तथा भाई-भतीजावाद के नाम पर मत का दान किया जा रहा है, जिसका परिणाम देशहित में नहीं हो रहा है.
. चुनाव से 6 महीना पहले विज्ञापन पर पूर्ण रूपेण रोक लग जाना चाहिए. विज्ञापन से जनता दिग्भ्रमित हो जाती है, और स्व-विवेक से मत अधिकार का उपयोग नहीं कर पाती है. मिडिया की निष्पक्षता भी चुनाव के दौरान एक बड़ी मुद्दा है. सभी मोर्चों पर चौकस हो कर सभी मुद्दों का विश्लेषण होना चाहिए, और देश में ऐसी जागरूकता फैलानी चाहिए कि चुनाव के प्रति लोग जागरूक हों, और उनमें जागरूकता आये. जैसे हम खरीदारी के दौरान एक-एक चीजों को उलट-पलट कर देखते हैं, आलू-प्याज को भी चुन कर लेते हैं, पर जन-प्रतिनिधि का चयन करने में उदासीन हो जाते हैं. जनता चुनाव के महत्व को क्यों नही समझती है? इसके लिए कौन दोषी? बिवेचन की जरुरत है. जनता को जगाये बिना देश नहीं जागेगा और हर चुनाव में महंगाई बढ़ने से खर्चे बढ़ जायेगा की नीति देश में चलती रहेगी. इस खर्चीली चुनाव से निजात पाना देश के लिए नितांत आवश्यक है.



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
May 15, 2014

चुनाव में बढ़ता खर्च लोकतंत्र के लिए अति हानिकारक है क्यूंकी चुनाव उपरांत नेतागण चुनाव में खर्च होने वाले पैसों की उगाही ५ साल तक अपने चमचो एवं रिश्तेदारों के माध्यम से करते हैं अगर इसी का नाम लोकतंत्र है तो ऐसे तंत्र से जनता को निजात चाहिए चुनाव के दौरान सरकारी आंकड़ों के हिसाब से अरबों का खर्च इस चुनाव में हुवा है इसके आलावा नेताओं द्वारा गलत और भ्रष्ट तरीके से उगाहा गया धन का प्रयोग सभी चुनावों में होता है और चुनाव आयोग हर बार स्वतन्त्र और निस्पक्ष चुनाव कराये जाने का दवा ठोकता है . मेरी राय में चुनाव को कुछ वर्षों तक रोक दिया जाए और अगर च हनी हुयी सरकार जनता के हिट में काम नहीं करती तो उसे गिराने का अधिकार जनता को दिया जाए और फिर चुनाव न करके देश के काम को अधिकारीयों के जिम्मे छोड़ा जाये जो जनता के लिए जवाबदेह हो और देश के न्यायालय भ्रष्ट अधिकारीयों को जल्द से जल्द सजा दिलाने में सक्षम हों कुछ ऐसा प्रयोग करने की जरूरत है हर हाल में भ्रष्ट लोगों को जेल में होना निहायत जरूरी है और इसे देश का सर्वोच्च न्याययालय ही करने में सक्षम है पर चुनाव में देश का अरबों खर्च करना लोकतंत्र को हमेशा के लिए कमजोर करने वाली बात है मेरी राय हो सकता है न जचे पर चुनाव में भारत जैसे गरीब देश का इतना सारा धन का बर्बाद होना भी कहीं से जायज नहीं इसपर चर्चा होनी चाहिए एक अच्छा आलेख

jlsingh के द्वारा
May 14, 2014

जैसे हम खरीदारी के दौरान एक-एक चीजों को उलट-पलट कर देखते हैं, आलू-प्याज को भी चुन कर लेते हैं, पर जन-प्रतिनिधि का चयन करने में उदासीन हो जाते हैं. जनता चुनाव के महत्व को क्यों नही समझती है? इसके लिए कौन दोषी? बिवेचन की जरुरत है. जनता को जगाये बिना देश नहीं जागेगा और हर चुनाव में महंगाई बढ़ने से खर्चे बढ़ जायेगा की नीति देश में चलती रहेगी. इस खर्चीली चुनाव से निजात पाना देश के लिए नितांत आवश्यक है. प्रिय राजेश दुबे जी, आपका कहना बिलकुल सही है …पर क्या कहें हमारे मित्रगणों में कुछ लोग ऐसे थे जिन्हे भाजपा प्रत्याशी का नाम भी नहीं पता था और उन्होंने मोदी के नाम से कमल का बटन दबा दिया …मीडिया रिपोर्ट में भी सुना होगा आपने की जहाँ भाजपा की सहयोगी दाल था वहां भी लोग कमल का निशान खोज रहे थे. अभी बहुत ज्यादा जागरूकता और राजनैतिक समझ की जरूरत है साथ ही साथ मैं हमेशा यही कहता हूँ अच्छे और ईमानदार लोगों को राजनीति में आने की जरूरत है…सादर!


topic of the week



latest from jagran