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रेलवे को अक्षम नहीं, सक्षम होना चाहिए

Posted On: 27 Oct, 2014 Others में

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. भारतीय रेलवे ने हर बार की तरह इस बार भी दुर्गापूजा, दीपावली और छठ पूजा में यात्रियों को निराश किया है. सुविधा के नाम पर किराया बढ़ाया जाता है, पर किराया बढ़ जाने के बाद भी सुविधा गायब रहती है. नई सरकार से उम्मीद पाले हुए और इसके अंधभक्तों को भी निराशा हुई है. पिछले महीनों में पैंट्रीकार में काँक्रोच और कीड़े-मकोड़े की उपस्थिति को मिडिया में दिखाया गया था. लड्डू में नट-वोल्ट पाया गया था. पेंट्रीकार की स्थिति और उसमे भोजन बनाने की प्रक्रिया को देख कर बहुत सारे लोगों ने रेलवे का भोजन का वहिष्कार कर दिया है. इस तरह रेलवे की कई खामियों को दर्शाया गया था. यात्री किराये की वृद्धि गुणवत्ता और सुविधा के नाम पर की जाती है, पर सही मायने में जनता को ठगा जाता है, और जनता ठगी जाती है. कल दिल्ली से रेल में चढ़ने के दौरान भीड़ के कारण गिर जाने से एक नौजवान को जीवन से हाथ धोना पड़ा. वह अपने घर छठ पूजा के लिए आ रहा था. उत्तर प्रदेश, और बिहार की ओर आने वाली गाड़ियों को देख कर रेलवे पर गुस्सा और दया दोनों आता है.
. दो महीने पहले से रेलवे को यात्री किराया दे कर लोग टिकट खरीदना शुरू कर देते हैं. रेलवे के पास कन्फर्म टिकटों के अलावे वेटिंग टिकटों के लिए पैसा आ जाता है. रेलवे के पास रेल चलाने के दिन तक पूरी सुचना होती है कि कितने लोग यात्रा करने वाले हैं. अगर सरकार सक्षम हो और प्रवंधन का समुचित ज्ञान और तो जनता के दिए गए धन से बहुत लाभ हो सकता है, और सारे यात्रियों के आवागमन की व्यवस्था हो सकती है. बैंकों को उदहारण के तौर पर देखा जा सकता है, जो जनता के पैसे से देश में विकाश की गति देते हैं. उनकी प्रवंधकीय क्षमता ही है, कि जमाकर्ता जब चाहते हैं अपना धन ले लेते हैं, और कम से कम 15 दिन तक के शर्त पर मुनाफा भी प्राप्त कर लेते है. रेलवे को बैंकों से सिखने की जरुरत है. रेलवे पर गुस्सा तो तब आता है जब यात्रा के दिन तक आदमी समझ नहीं पाता है कि टिकट कन्फर्म होगा या नहीं. टिकट कन्फर्म नहीं होने की स्थिति में बैंकों से उलट रेलवे मुफ्त में कुछ पैसा काट भी लेता है.
. प्रत्येक यात्री जब चाहे यात्रा कर सके इसके लिए चिंतन की जरुरत है. बहादुरी इसमें नहीं है कि रेलवे जनता के जेब से कितना पैसा निकाल लेती है, बहादुरी इसमें है कि रेलवे अपने प्रतिभा संम्पन विशाल कार्य-कर्ताओं से कम पैसे में कितना अधिक से अधिक जनता को लाभ दे सकता है. वैसे जब लोगों को जाना होता है तो इस मन: स्थिति में होते हैं कि बाथरूम के पास बैठने में भी उन्हें तनिक संकोच नहीं होता है. वर्तमान में ट्रेनों की स्थिति को देख कर तो यही दीखता है कि लोगों को सिर्फ अपने गंतव्य तक जाने की पहली प्राथमिकता होती है. अभी जरुरत है, पहली प्राथमिकता पर विजय प्राप्त करने की. रेलवे को भी अब अपनी बेशर्मी को छोड़ना चाहिए और लोगों को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि लोगों के अनुरूप रेलवे तैयार है और लोग जब चाहे आ जा सकते हैं. यात्री किराया जब भी बढ़ता है, लोगों को ठीक नहीं लगता है. रेलवे को अपने को इस तरह बनाना होगा कि लोग ख़ुशी-ख़ुशी कहने की स्थिति में हों कि रेलवे को अब किराया बढ़ा लेना चाहिए. रेलवे को अक्षम नहीं, सक्षम होना चाहिए.

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4 प्रतिक्रिया

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Lettie के द्वारा
October 17, 2016

You know what, I’m very much inicenld to agree.

jlsingh के द्वारा
October 27, 2014

प्रत्येक यात्री जब चाहे यात्रा कर सके इसके लिए चिंतन की जरुरत है. बहादुरी इसमें नहीं है कि रेलवे जनता के जेब से कितना पैसा निकाल लेती है, बहादुरी इसमें है कि रेलवे अपने प्रतिभा संम्पन विशाल कार्य-कर्ताओं से कम पैसे में कितना अधिक से अधिक जनता को लाभ दे सकता है. वैसे जब लोगों को जाना होता है तो इस मन: स्थिति में होते हैं कि बाथरूम के पास बैठने में भी उन्हें तनिक संकोच नहीं होता है. वर्तमान में ट्रेनों की स्थिति को देख कर तो यही दीखता है कि लोगों को सिर्फ अपने गंतव्य तक जाने की पहली प्राथमिकता होती है. अभी जरुरत है, पहली प्राथमिकता पर विजय प्राप्त करने की. रेलवे को भी अब अपनी बेशर्मी को छोड़ना चाहिए और लोगों को ये विश्वास दिलाना चाहिए कि लोगों के अनुरूप रेलवे तैयार है और लोग जब चाहे आ जा सकते हैं. यात्री किराया जब भी बढ़ता है, लोगों को ठीक नहीं लगता है. रेलवे को अपने को इस तरह बनाना होगा कि लोग ख़ुशी-ख़ुशी कहने की स्थिति में हों कि रेलवे को अब किराया बढ़ा लेना चाहिए. रेलवे को अक्षम नहीं, सक्षम होना चाहिए. आपसे पूरी तरह सहमत आदरणीय राजेश दुबे जी… वेटिंग लिस्ट वाले या कन्फर्म वाले सबकी स्थिति एक जैसी हो गयी …९० यात्रियों के बैठने की जगह में ७०० यात्री कैसे गए होंगे हम सब अनुमान लगा सकते हैं……


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