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बेशर्म दलबदलू

Posted On: 5 Nov, 2014 social issues में

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. दल-बदल कानून का खौफ संसद और विधान सभाओं में देखने को मिलता है, पर चुनाव के पहले दलबदलुओं की जो शर्मनाक हरकते देखने को मिलती है, वह निंदनीय है. देश में इस बुराई को फैलाने में सभी दलों का सहयोग है. देश की जनता देखती है कि कुर्सी के लोभ में नेता-गण कैसे रातो-रात एक दल छोड़ दूसरे दल में चले जाते हैं. यह सोचने वाली बात है कि विचार रातो-रात नहीं बदल सकता है. कांग्रेसी विचारधारा के लोग घंटों में बीजेपी के विचारधारा को कैसे मानने लगेगें हैं? किसी भी विचारधारा को मन में जगह बनाने में वक्त लगता है, पर दलबदलुओं के विचार परिवर्तन का जो रूप देखने को मिलता है, उससे मनोविज्ञान के विद्धान भी भौचक हैं.
. इस तरह का दल-बदल जनता के साथ धोखा है. जनता सत्ता बदलती है, पर चेहरे वहीँ रह जाते हैं. आचरण और व्यवहार वहीँ रह जाता है. राजनीती की इस खतरनाक प्रवृति से जनता और समाज को घाटा ही हो रहा है. पार्टियां अपने संगठन विस्तार और दुशरे दल को कमजोर करने के लिए दलबदलुओं को पनाह देती हैं, पर सोचने वाली बात है, कि सदन के भीतर जो गलत हैं, वह सड़क पर कैसे अच्छा हो सकता हैं. दल-बदल कानून और दलबदलुओं पर सिकंजा सिर्फ सदन में ही नहीं सदन के बाहर भी जरुरी है. रातो-रात विचार बदलने का नाटक सिर्फ जनता के साथ धोखा ही है. आज वोट को प्रभावित करने वाले तत्वों की पार्टियों में बहुत पूछ है, और वहीँ दल के कार्यकर्ता जो वास्तव में सालो-साल से पार्टी के नीति सिद्धांतों से जुड़ कर समाज में पार्टी की छवि को दिखाने का काम करते हैं, सुदूर देहात में घंटों पैदल चल कर अपने पार्टी के बारे में बताते हैं, हासिये पर है. पार्टी कार्यकर्ताओं की दुर्गति का कारण चुनाव आयोग का वह कानून है, जिसमें अकेला व्यक्ति दल-बदलने से अयोग्य हो जाता है. जब अकेला सदस्य भी पार्टी छोड़ कर जा सकता था, तब पार्टियां अपने समर्पित कार्यकर्ता को ढूंढती थी. पार्टियां मंथन करती थी कि कौन सा कार्य-कर्ता चुनाव जितनें के बाद भी पार्टी छोड़ कर नहीं जायेगा, इस लिए समर्पित कार्यकर्ताओं की पूछ होती थी, आज ये डर किसी भी पार्टी के अंदर नहीं रह गया है. पार्टियां निरंकुश हो गई हैं. चुनाव के समय नियम विरुद्ध पैसे खर्च कर सत्ता प्राप्ति के हथकंडे अपनाये जाते हैं. इस्तेमाल करो और फेकों की नीति पर सारी पार्टियां चल रही हैं. आज कोई भी सदस्य अकेला पार्टी छोड़ कर नहीं जा सकता है. पहले दल-बदल अभी के तुलना में नहीं के बराबर था. पार्टिया दूसरे दल से आये लोगो के बारे में आशंकित रहती थी. डर बना रहता था, पुन:भागने का. नेता-गण भी दल बदल कर अपनी साख नहीं गवाना चाहते थे.
. चुनाव के पहले दल बदलने के बारे में भी चुनाव आयोग को सोचना होगा. इस मजाक-पूर्ण और जनता को ठगने वाली परंपरा को रोकने के लिए भी एक ठोस नीति बनाने कि जरुरत हैं. सत्ता पाने के लिए घूम-घूम कर पाला बदलने वालों को रोकना जरुरी है. आज देश में दल-बदल से लोकतंत्र मजाक बन गया है. सभी दलों को अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना होगा. सिर्फ सत्ता पाने की चाह से देश का भला नहीं होना है इस बात को सबको मिल कर सोचना है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
November 19, 2014

dal badaluon se janta ko koyi ummid nahi hai kyunki pahle bhi dal badlu apne maksad ko poora karne koyi mantri paane jaise lalach se grast hote hain ve apna hit sadhte hain janta ka hit unki diksnari men nahin ek achha aalekh


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