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सारी पार्टियां राजनीति नहीं करें

Posted On: 26 Apr, 2015 social issues में

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. सत्य का ये वाक्य, “सारी पार्टियां राजनीति नहीं करें” खुदकुशी करने वाले किसान गजेंद्र सिंह की बेटी मेघा का है. मेघा ने अपने एक वाक्य में किसानो के नाम पर हो रहे राजनीति को बखूबी समझते हुए ये बात कही है. देश का किसान वर्ग जो बोलना चाहता है उसे मेघा ने बोल दिया. राजनैतिक पार्टियों को किसानों के दुर्दशा से कुछ लेना देना नहीं है. उन्हें तो बस सत्ता चाहिए, चाहे इसके लिए जो भी बोलना पड़े. सत्ता में रहने वाले की बोली विपक्ष में जाते ही बदल जाती है. सत्ता वाले को जो पूरब दिखता, विपक्ष में जाते ही वह पश्चिम हो जाता है. उसकी बोली बदल जाती है. राहुल गांधी अब जोर से जो बोलते हैं वह किसान की बात बोलते है. भाजपा भी किसान की बात बोलती है. भाजपा किसान की मुवावजा की बात बोलती है. किसानो को मुवावजा के लिए तैयार करने की अभियान में भाजपा दिखती है. अरविन्द केजरीवाल की पार्टी “आप” भी किसान आंदोलन के राजनीति में कूद पड़ी है, पर “आप” को बदनामी झेलनी पड़ रही है. गजेन्द्र सिंह के आत्म हत्या के कलंक को सभी पार्टियां “आप” को थोपना चाहती है. पर सत्य है की आजादी के बाद से अलग-अलग पार्टियों की सरकार आई और गई, पर किसानों की दशा, दुर्दशा में बदलती गई. हालत बाद से बदतर होती गई.
. देश का कोई भी अर्थ-शास्त्री किसानी के अर्थ शास्त्र को समझने का प्रयास नहीं किया. कहने के लिए किसानों के नाम पर आंदोलन होता है, किसानों पर लेख लिखे जाते हैं, किताबें लिखी जाती है, पुरस्कारें बटती हैं, पर किसान को समझने का प्रयास किसी ने नहीं किया. मुवावजा की बात होती है, जमीन की कीमत तय की जाती है, पर किसान के जीवन-मरण से जुड़े मुद्दों पर बात नहीं होती है. जमीन से जो नहीं जुड़े हैं वे जमीन की कीमत रूपये में आंकते हैं. पर जो मिटटी से जुड़े हैं, जो किसान हैं, वे जमीन को इज्जत से जुड़ा समझते हैं, धरती माता समझते हैं. प्राण से बढ़ कर मानते हैं. किसान कभी लाभ-हानि को गहराई से नहीं जोड़ते. किसान अगर लाभ हानि की बात करते तो खेती घाटे की वस्तु है. समाजवादी चिंतक किशन पटनायक के नेतृत्व में 1978 में खेती पर सर्वे किया गया था. बिहार के भोजपुर जिले के दुबौली गांव में सर्वे किया गया था, जिसमें एक कृषक परिवार की कृषि उपज की कीमत निकाली गई थी, और परिवार वालों के द्वारा किये गए श्रम की न्यूनतम कीमत को जोड़ा गया था. कृषि उपज के कीमत से ज्यादा मजदूरी में खर्च आया था. इस सर्वे को किशन पटनायक द्वारा सम्पादित सामयिक वार्ता में प्रकाशित किया गया था. किशन पटनायक 1962 -1967 में संसद सदस्य थे. इस पुरानी सर्वे को नए ढंग से सरकारी ढंग से जानने की जरुरत है कि आखिर कृषि कितने घाटे की है, जो आत्म हत्या तक को मजबूर करती है.
. कृषि पर देश की 85 % जनसँख्या निर्भर है. हाड़तोड़ मेहनत के वावजूद भरपूर भोजन की गारंटी नहीं है. हम आकड़ों में चाहे जितनी सम्पन्नता दिखा दे पर सचाई सामने है. आज देश के नीति निर्धारकों को सचाई से कृषि की कमियों को जानने की जरुरत है. कल-कारखाने देश के लिए जरुरी है पर अन्न इससे ज्यादा जरुरी है. किसान आंदोलन हो, पर इस नाम पर सिर्फ राजनीति न हो. हम अपनी पीठ स्वयं चाहे जितना थपथपा लें पर विश्व बिरादरी में अछूत बने रहेंगे, देश में जब तक किसान आत्म हत्या करते रहेंगे. आज मेघा के इस वाक्य को समझने की जरुरत है कि सारी पार्टियां राजनीति नहीं करें.



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 27, 2015

श्री राजेश जी थी लिखा है आपने सभी दल आज कल किसानों को अपना वोट बैंक बनाना चाह र हैं किसानों की बात की जाती हैं लेकिन उनकी जीवन की समस्याओं की अनदेखी हो रही है खेती जबकि सबसे जरूरी व्यवसाय है


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