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कम मतदान, चिंतनीय

Posted On: 30 Oct, 2015 social issues में

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. बिहार चुनाव का तीसरा चरण संपन्न हो गया. लोकतंत्र के इस पावन पर्व पर लगभग आधा से थोड़ा कम मतदाताओं ने भाग नहीं लिया. आंकड़े बताते हैं कि 54% से कम मतदान हुआ. पहले और दूसरे चरण में भी मतदान का प्रतिशत आकर्षक नहीं था. अभी दो चरण बाकी है और लगता नहीं है कि मतदान का प्रतिशत बहुत ज्यादा बढ़ेगा. मतलब कि 70 -80 प्रतिशत मतदान नहीं होगा. यह सोचने वाली बात है कि बिहार में किसी भी पार्टी या व्यक्ति की सरकार बनेगी उन्हें आधे से ज्यादा या आधा मतदाता का समर्थन नहीं होगा. यही स्थिति पुरे देश की है.
. लोकतंत्र की दुहाई देने वाले देश भारत में मतदान का प्रतिशत 90 -99 होना चाहिए था. अगर खीच-खाच कर 55 -60 % पहुँचता हैं तो भी यह लोकतंत्र के साथ मजाक है. राजनैतिक दल जो मत पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडा अपनाते हैं. जाति-बिरादरी से ले कर बीफ तक की बातें करते हैं, उनके लिए भी यक्ष प्रश्न हैं कि आप मतदाताओं के जागरूकता के लिए क्या कर रहे है? चुनाव के समय नींद से जगी चुनाव आयोग भी इस सवाल पर कठघरे में है. जनता आज भी अगर मतदान और योग्य सरकार चुनने के प्रति जागरूक नहीं हुई है, तो आखिर दोष किसका है ? एक पाउच में भी मत बेचने और मतदान को फालतू समझने वाले भारतीय मतदाताओं के अज्ञानता के लिए किसी को तो जवाबदेह होना पड़ेगा. मतदान के प्रति जागरूकता फैलाने और मत को अमूल्य, जान से भी ज्यादा, समझाने के लिए किसी को तो आगे आना पड़ेगा.
. बहुत से मतदाता काम की तलाश में आपने क्षेत्र से बाहर होते हैं, और चुनाव के समय, अपने घर-परिवार की पेट भरने की चिंता रहती है, वैसे मतदाता कैसे अपना मतदान करें, इसके लिए कारगर उपाय ढूढ़ना होगा. आधार कार्ड में आँख की पुतलियाँ और हाथ के अँगुलियों के निशान होते हैं, इनको पहचानने वाले सॉफ्टवेर के मदद से भी मतदान का का तरीका ढूंढा जाना चाहिए. तकनीक इस तरह का होना चाहिए कि हम 54 -55% मतदान को बहुत ज्यादा मतदान मानने की नादानी न करे.
. गांव-देहात में मतदान कराने आये कर्मियों के अंदर मतदान के प्रति किसी तरह का आकर्षण नहीं रहता है, और उन्हें लगता है की मतदान का दायित्व जबरदस्ती का मिला हैं, इसे किसी तरह संपन्न हो जाना चाहिए. चुनाव के दिन सभी मतदान केन्द्रों पर एक ही तरह के प्रतिशत में वोट पड़ता दीखता है, जो संदेह पैदा करता है कि क्या मतदाता सलाह कर लिए हैं कि सभी बूथों पर एक ही तरीके से मतदान किया जायेगा ? चुनाव के तरीकों में आवश्यक सुधार की जरुरत है. आजादी के 68 साल कम नहीं होते है ? पार्टियां, राजनेता हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं. कोई साठ साल वाले को दोष देता है, तो किसी को सौ दिन वाले वादों को याद कराया जाता है. कोई जंगल राज की बात करता है, तो कोई मंडल राज. पर भारतीय लोकतंत्र की जो मजबूती चाहिए थी, वह आजादी के बाद से अब तक नहीं दीखता है. आज भी हम आरक्षण की स्थिति में हैं, जबकि स्थिति यह होना चाहिए था कि जितना हाथ उतना काम. जितने लोग उतना रोजगार.
. अगर भारत को मजबूत करना है तो लोकतंत्र को मजबूत करना होगा. राजनेताओं पर उलुल-जुलूल बोलने पर पाबंदी लगानी होगी. मतदाताओं को वोट के प्रति जागरूकता फैलाना होगा. उनको बताना होगा की मत अमूल्य है, इसे दारू और जज्बातों में आ कर बर्बाद नहीं करना है. चुनाव के समय भावनाओं को भड़काने वाली बातों पर रोक लगाने का खास उपाय करना होगा. कानून की गलत व्याख्या करने वालों पर सख्ती करनी होगी.
. अब और दो चरणों के मतदान में कुछ प्रतिशत की ही वृद्धि हो जाती है तो इसे ही उपलव्धि मान लेना होगा, पर राजनैतिक दल और दल के नेता जनता को गुमराह न करें और मतदान की उपयोगिता बढ़ाने में एक स्वास्थ्य परिचर्चा करें, यह देश के लिए सौभाग्य होगा.

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Mircea के द्वारा
October 17, 2016

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Shobha के द्वारा
November 4, 2015

श्री राजेश जी रोजी रोटी के चक्कर में बिहार का पुरुष समाज बिहार से बाहर कमाने के लिये जाता है हाँ महिलाएं मतदान के दिन काफी निकली हैं बहुत अच्छा विचारणीय लेख


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