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जो नौकरी नहीं करते हैं

Posted On: 26 Nov, 2015 social issues में

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. सरकारी कर्मचारी खुश हैं. उनकी तनख्वाह में लगभग 24% की वृद्धि हो जाएगी. वेतन की समीक्षा करने वाली आयोग ने अपना प्रस्ताव वित्त मंत्री को सौप दिया है. सरकार भी खुश है. कम-से-कम अपने कर्मचारियों के लिए कुछ तो करने का बहाना मिला. पेंसन पाने वालों का भी पेंसन बढ़ेगा. वन रैंक वन पोस्ट अब सभी सरकारी कर्मियों को देने पर विचार चल रहा है. सभी को पत्ता है, इससे केंद्रीय खजाने का बोझ बढ़ेगा. महंगाई के लिए कर्मियों को महंगाई भत्ता भी मिलेगा. सब मिला-जुला कर सरकारी कर्मियों के बारे में सोचने वाली आयोग वेतन आयोग तो है.
. लेकिन दुखद पहलु ये है कि जो सरकारी नौकरी नहीं करते हैं, उनके बारे में कौन सोचेगा ? व्यवसायी वर्ग तो अपना मुनाफा किसी न किसी रूप में ले ही लेता है, पर उन किसानो और मजदूरों के लिए कौन सोचेगा, जो दिन भर के हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी दाल, भात और सब्जी नहीं खा पाते हैं. इन गरीब-गुरबों और अभाव तथा कर्ज में डूबे हुए किसानो के लिए किसी का दायित्व बनता है या नहीं ? बहुसंख्यक होते हुए भी असंगठित लोगों के लिए आखिर किसी का तो दायित्व होगा? किसान और कृषक मजदूरों के बच्चों को भी पढाई की सुविधा कौन देगा.? तबियत खराब होने की स्थिति में नीम-हकीमों के भरोसे जिंदगी की गाड़ी कब तक चलेगी? देश की अधिकतम आबादी गावों में रहती है. इनका जीवन-यापन कृषि पर आधारित है. मगर दिनों-दिन कृषि के क्षेत्र में ह्रास हो रहा. इनके आमदनी के रास्ते धीरे-धीरे ध्वस्त हो रहे है. अंग्रेजों के ज़माने की नहरों की सिचाई क्षमता आधा से भी कम हो गया है. कृषि से संवंधित व्यापर पर बिचौलियों का कब्जा हो गया है. खेती घाटे की सिद्ध हो चुकी है. इन सारी समस्याओं पर कौन सोचेगा?
. कहने को तो राष्ट्रीय किसान आयोग भी है, पर धरातल पर यह आयोग कही नहीं दीखता है. वेतन आयोग जैसा कोई विशाल हृदय वाला महापुरुष, कृषक और मजदूरों के लिए नहीं है. गावों में कृषक, अपने खेतों में पुरे परिवार के साथ काम करते हैं, पर काम में लगाये गए श्रम की पूरी मजदूरी भी उन्हें नसीब नहीं होता. इनके लिए ऐसा कोई नहीं है, जो सभी को नजर अंदाज कर वेतन वृद्धि की सिपारिश कर दे. किसान आयोग के पास कृषि से संवंधित सुख-दुःख का ज्ञान नहीं है, या उन्हें इस पर नहीं सोचने का मन बना लिया हो. मजदूरी का दर मजदूरों का तय है, पर काम मिले तब तो. काम कराने वाले की क्षमता अधिकतम मजदूरी देने की हो, तब तो. मजदूरी कराने वाला भी मजदुर ही अगर हो तब, किससे मजदूरी की लड़ाई होगी. सच्चाई ये है कि खेती का हिसाब-किताब किया जाय तो खेती घाटे की है. सरकारी योजनाएं किसानों तक नहीं पहुँच पाती है. कहने के लिए तमाम योजनाएं हैं, पर अब तक असंगठित क्षेत्र को इसका लाभ नहीं दीखता.
. किसान और किसानी में लगे हुए लोगों पर एक व्यापक विश्लेषण की जरुरत है. किसान आयोग का अर्थ शुद्ध रूप से किसानों के हित के लिए हो. वरिष्ठ पत्रकार सुधांशु रंजन ने राष्ट्रिय आय नीति बनाने का विचार रखा है. वास्तव में देश में आय नीति की जरुरत है. आय की असमानता अंग्रेजी शासन से भी ज्यादा भारत में देखने को मिलता है. देश की तरक्की, और विकाश का हम चाहे जितना ढिंढोरा पिट लें, पर जब तक भारतीय जनता की आवश्यक, आवश्यकता की पूर्ति नहीं होगी, तब तक सही मायने में विकाश की बात कहना बेमानी है. आय की असमानता को ले कर हम विश्व गुरु कभी नहीं बन पाएंगे.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

masoom के द्वारा
November 29, 2015

गांव और गांव के लोगों की अनदेखी कर भारत मजबूत नहीं हो सकता.


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