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विकाश की पृष्टभूमि

Posted On: 1 Nov, 2015 Others में

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. देश के साहित्यकार अपने पुरस्कारों को लौटा रहे है. वैज्ञानिक पी. एम. भार्गव ने भी पद्मश्री लौटाने की बात कही हैं. इस कड़ी में अब कलाकार भी जुड़ गए हैं. यह विरोध देश में हो रहे गलत वातावरण के खिलाफ हो रहा है.असहिष्णुता के खिलाफ हो रहा है. हिन्दू सेना के लोग बीफ के नाम पर हंगामा खड़ा करते है. शिव सेना के लोग आर. टी. आई. कार्यकर्त्ता को बीच सड़क पर पीट रहे हैं. इस दृश्य को मिडिया में दिखाया जा रहा है. पुरे देश में गुस्सा है. बिहार में चुनाव हो रहा है. जनता को बताया जा रहा है कि भाई अगर बीजेपी हार गई तो पाकिस्तान में खुशी मनाई जाएगी. देश में प्यार और भाईचारा समाप्ति पर है. जाति और संप्रदाय पर बहस हो रहा है. देश किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष की है, या देश में रह रहे सभी भारतीयों की? हिंदुत्व जरुरी है या विकाश? आज के दिन में इस अहम सवाल पर चिंता करने की जरुरत है.
. एक तरफ एकता की बातें की जा रही है, दूसरी तरफ देश में विषमता की बातें हो रही है. साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों और फिल्मकारों के विरोध का सम्मान करना चाहिए. आखिर गुस्सा का कारण क्या है? इसको समझना भी जरुरी है. लेकिन इस दिशा में भी गलती हो रही है. इनकी गुस्सा को भी दूसरे रूप में मोड़ा जा रहा है. जिम्मेवार लोग इनको जमकर गालिया रहे हैं. इनके आक्रोश को समझने के वजाय आक्रोश को बढ़ा रहे है. ताज्जुब तो तब होता है कि पुरस्कार लौटने वाले एक फिल्मकार को एक गायक कहलाने वाला व्यक्ति नपुंसक और नामर्द कहता है. कहता है कि मैं फलां को फटी जूतों से पिटूँगा. यह सारा दृश्य एक न्यूज चैनल पर बहस के दौरान का है. पूरा देश इस तरह की बहस को देख रहा है, और बोलने वाले को किसी तरह का कोई खौफ नहीं है. न्यूज चैनलों पर बहस को देख कर लगता ही नहीं है कि भारत उच्च सोच वाले लोगों का देश है. बे मतलब के बातों को हवा दे कर पता नहीं देश को किस रास्ते पर ले जाने की कोशीस की जा रही है.
. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने आपसी सम्मान और सहिष्णुता के परिवेश में सुधार लाने का आह्वान किया है. साथ ही साथ उन्होंने ये भी कहा है कि राजनैतिक स्तर से चीजों को ठीक करने की अत्यधिक सक्रियता से प्रगति का मार्ग अवरूद्ध होता है। रघुराम राजन ने समाज में किसी को अपमानित करने किसी समूह को ठेस पहुँचाने की करवाई पर रोक लगाने की बात कही है. रिजर्व बैंक के गवर्नर से पहले साख निर्धारण एजेंसी “मूडीज” ने भी भारत में अमन और सहिष्णुता को बढ़ावा देने की जरुरत पर बल दिया है. सुब्रमण्यम स्वामी जैसे उच्च कोटि के व्यक्ति ने रघुराम राजन के व्यान पर असहिष्णुता का परिचय दिया है. रिजर्व बैंक का गवर्नर कोई मंद बुद्धि का नहीं होता है पर श्री स्वामी ने उनको चेतावनी दी है और दादा न बनने की नसीहत दी है.
. अच्छे बातों का उल्टा रूप हो जाना, किसी के गुस्से का सम्मान न करना देश के लिए ठीक नहीं है. एक तरफ हम एकता के लिए दौड़ते हैं, दूसरे तरफ रिजर्व बैंक के गवर्नर को औकात में रहने की नसीहत देते हैं. कलाकार साहित्यकार, वैज्ञानिक और फिल्मकारों के गुस्से को दबाने के लिए आँख दिखाते हैं. अगर रिजर्व बैंक का गवर्नर कहता है कि देश का बिगड़ता माहौल ठीक नहीं हुआ तो विकाश का पहिया रुक जायेगा तो यह चिंता का विषय है न कि कहने वाला उपहास का योग्य है. सही बातों की समझ की प्रवृति और आदत, विकाश के लिए आवश्यक है. अपनी बातों को मनवाने के लिए किसी भी हद में जाने का हिम्मत रखने वाले लोगों से आग्रह हैं की देश हित में थोड़ा चुप रहना भी सीखिये. सहनशीलता के अभाव में मनुष्य पत्थर हो जाता है. विकाश की पृष्टभूमि के बाद ही विकाश सम्भव है. इस लिए आवश्यक है कि बिना किसी अहम् के विकाश की पृष्टभूमि का निर्माण किया जाय, और भारत को विकशित किया जाय.
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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 1, 2015

राजेश जी इन्हें आज तक पुरूस्कार लौटाने का विचार नहीं आया क्या आज तक देश में कुछ नहीं हुआ ?सब ठीक हो जाएगा बस बिहार के चुनाव के बाद | कांग्रेस के राज में बाबरी ढांचा टूटा किसी की आत्मा नहीं जगी | नन्हीं बच्चियां सुरक्षित नहीं है किसी की कलम नहीं चलती वैज्ञानिक भी रेस में आ गए हैं


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