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हमारे बेटे कब तक शहीद होते रहेंगे ?

Posted On: 7 Jan, 2016 Others में

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. . . हमारे बेटे आखिर कब तक शहीद होते रहेंगे ? क्या हम अपने ही घर में शहीद होने की परम्परा को रोक नहीं सकते हैं? पठानकोट हमला के बाद ये तमाम सवाल लोगों के जेहन में उमड़-घुमड़ रहे हैं. हम इस बात को बिना किसी संकोच के कह सकते हैं कि कहीं न कहीं हम चूक जाते हैं और चकमा देने वाले हमें चकमा दे देते हैं. 26 /11 / और ऊधमपुर की घटना के बाद लगा था कि देश में घुसपैठ पर नज़र रखने वाले अब चौकस हो गए होंगे, पर पठानकोट कि घटना ने सिद्ध कर दिया कि हमारी लापरवाही ख़त्म नहीं हुई हैं.
…. 1999 में कारगिल में भी घुसपैठियों को भागने के लिए सेना को ऑपरेशन “विजय” चलना पड़ा था. 1999 पाकिस्तान ने हमारे देश को अशांत करने के लिए अपने सैनिको को घुसपैठियों के रूप में भेजा था. उस घुसपैठ की भी जानकारी हमारे देश के उन तंत्रों द्वारा नहीं मिला जिनको इस तरह के कामों की जवाब-देही सौपी गई हैं. 1999 में घुसपैठ की जानकारी एक ग्रामीण के द्वारा सेना को मिली थी, और सेना ने जब घुसपैठ के बारे में अपने स्तर से पता लगाया तो पता चला कि लम्बे भू-भाग पर घुसपैठ हो चूका हैं. घुसपैठ की जानकारी समय पर न होने का खामियाजा सम्पूर्ण देश को भुगतना पड़ा और 450 से ज्यादा हमारे सेना के जवान शहीद हो गए.
. . … चूक की एक लम्बी श्रृंखला हैं, पर अब उन चूकों से सिखने का वक्त आ गया हैं. जितनी भी एजेंसियों को इस तरह के काम को रोकने की जवाब-देही सौपी गई हैं, उन्हें आत्म विश्लेषण की जरुरत हैं. बातों के क्रम में यह भी छन-छन के आई हैं कि हमारी इक्षा शक्ति कमजोर हैं. हमारे सेना के जवान और अधिकारी राजनैतिक इक्षा-शक्ति की कमजोरी से चिंतित हैं. क्यों न एक बार आर-पार की लड़ाई सेना पर बिना किसी राजनैतिक दबाव की लड़ी जाय. पाकिस्तान से हमदर्दी रखने वाले देश, या पाकिस्तान को इस्तेमाल करने वाले विश्व-विरादरी के देश निश्चित ही हमारी आलोचना करेंगे, जिसकी परवाह करने की जरुरत नहीं हैं. पाकिस्तान को जवाब देने की जुबानी जंग तो बहुत लड़ते हैं, पर वास्तविक लड़ाई नहीं लड़ते हैं. पाकिस्तान हमारी शांति प्रियता को भंग कर देता हैं और हम हाथ मलते रह जाते हैं. पठानकोट में छह की संख्या में आये घुसपैठियों ने हमारे सात बेटों को ख़त्म कर दिए. यह बहुत बड़ी क्षति हैं, पर हम इसके बाद भी मुंछ ऐठ रहे हैं कि हमारी कोई बड़ी क्षति नहीं हुई.
. … जो हमें अशांत करे उससे हमदर्दी कैसी? हो सकता हैं कि पाकिस्तानी प्रधान-मंत्री नवाज शरीफ शांति चाहते हों, पर हिंदुस्तान का बच्चा-बच्चा जनता हैं कि पाकिस्तान का प्रधान मंत्री मिटटी का लोंधा होता हैं. पाकिस्तान के प्रधान मंत्री की बात न वहां कि सैनिक मानते हैं न वहां की गुप्तचर एजेंसियां. वहां के उग्रवादियों और चरम-पंथियों पर भी प्रधान मंत्री की कुछ नहीं चलती हैं. अब जैसा को तैसा नीति पर चलने का समय आ गया हैं. कारगिल युद्ध में जब पाकिस्तानी सैनिक भागने लगी थी, तब कम से कम 10 किलोमीटर तक घुस जाना चाहिए था. उस समय हम ऐसी स्थिति में थे. विश्व के कुछ देश पाकिस्तान को परोक्ष रूप में मदद करते हैं, उस समय उन देशों का भी नहीं सुनना चाहिए था. खैर जो बीत गई सो बात गई. अब इन बीते हुए से बहुत कुछ सिखने की जरुरत हैं. भारतवासियों की इक्षा हैं कि इस रोज-रोज के कीच-कीच से अच्छा हैं की एक बार जबरदस्त तरीके से आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को जवाब दिया जाय.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

harirawat के द्वारा
January 11, 2016

राजेश जी, नमस्ते ! समय निकल जाता है लेकिन इत्तिहास अपनी छाप पीछे छोड़ जाता है ! आपने कारगिल की बात की ! लेह लदाक कारगिल में एशिया की सबसे ऊंची बर्फीली चोटी टाइगर हिल है ! जहां बारह महीने बर्फ रहती है और हर समय ठंडी हवाओं का जोर रहता है ! चार महीने तो लगातार बर्फ पड़ती रहती है और बर्फ की चट्टाने खड़ी हो जाती है, बंकरों में जहां सैना के जवान अराउंड दी क्लॉक ड्यूटी देते हैं, उन्हें आक्सीजन की कमी होने से कही प्रकार की बीमारियां पकड़ लेती है, इसलिए ३ से ४ महीने के लिए इन पोस्टों को छोड़ का जवान नीचे उत्तर जाते थे ! इसका फ़ायदा वहीं के लोकल पाकिस्तानी पालित आंतकवादियों ने जो इलाके की बर्फीली चट्टानों और मौसम से भली भाँती परिचित थे, पाकिस्तानी आईएसआई और सैना की मदद से उन टाइगर हिल और आस पास की टेकड़ियों पर कब्जा कर दिया था ! कम से कम हजार सैनिकों के बलिदान देकर ही इन पोस्टों को दुश्मन के कब्जे से छुड़ा पाए थे भारतीय सैनिक ! सजग रहने की जरूरत है हमें भी और भरतीय रक्षा पंक्तियों को ! अच्छी लेख के लिए साधुवाद !

    Rajesh Dubey के द्वारा
    January 10, 2016

    भाई मुझे ख़ुशी हुई, कि आपने इस लेख को इस लायक समझा.

rameshagarwal के द्वारा
January 7, 2016

जय श्री राम राजेश जी बहुत अच्छी तरह भावनाए व्यक्त की आज देश में सब यही पूँछ रहे आप प्रधान मंत्री पर विश्वास रक्खे एक बार धोखा खा गए सेना तैयार है अब और आतंकवाद सहन नहीं होगा परन्तु उनके बारे में क्या कहा जाए जो कुर्सी के लिए देश बेचने को तैयार है.बंगाल में मालदा में मुसलमानों ने इतना हिन्सक प्रदर्शन किया सेक्युलर नेता मीडिया बुद्दिजीवी चुप केवल वोट के लिए ममता.लालू,कांग्रेस वाम दल केजरीवाल सब ऐसे है जो मीडिया दादरी पे २१ दिन बोलता रहा आज चुप क्यों हम लोगो ने इतिहास से सबक नहीं सीखा

Shobha के द्वारा
January 7, 2016

श्री राजेश जी यह आज का शाश्वत प्रश्न बन गया है एक जरा सा देश जिसमें अपने यहां शान्ति नहीं है हमें आँख दिखाता है


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