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दाना मांझी ने सबको झकझोर दिया

Posted On: 26 Aug, 2016 social issues में

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. . . हमने इसी महीने 70 वीं आजादी मनाई है. टीवी और अख़बारों में जो दिखा उससे हौसला बढ़ गया. हम स्वाभिमानी और विजेता देश के हैं. वाकई, आजादी शब्द उत्साह और रोमांच भर देता है. आजादी के जश्न के दस दिन बाद की खबरों से मायूसी छा जाता है. लगता है, कि देश में देश के स्यवंभू ठीकेदार और मठाधीश जब तक बने रहेंगे तब तक आजादी के क्या मायने है ? दाना मांझी से कोई पूछे इस देश के गौरव के बारे में जिसने अपनी मृत पत्नी को 12 किलोमीटर पैदल कंधे पर लेकर अस्पताल से गांव चला. 24 अगस्त को दाना की पत्नी की मृत्यु, भवानीपटना के अस्पताल में हुई. अस्पताल कर्मियों के बार-बार लाश हटाने के लिए कहने पर 25 अगस्त को गरीब और लाचार दाना मांझी को ऐसा करना पड़ा. दाना मांझी का गांव भवानीपटना से 60 किलोमीटर दुर है. भवानीपटना देश के सबसे पिछड़ा जिला, कालाहांडी(ओडिशा) में है. दाना मांझी का हिम्मत बढ़ाने वाली और साथ देने वाली उसकी बारह वर्षीय बेटी चौला साथ में थी. दाना के पास पैसा नहीं था कि वह एम्बुलेंस किराये पर कर ले. अस्पताल से उसे एम्बुलेंस मिला नहीं, दाना ने अपनी बेटी के साथ अपनी पत्नी की लाश उठा कर 60 किलोमीटर की दुरी तय करने के लिए चल दिया. 12 किलोमीटर की दुरी तय करने पर, जब लोगों और मिडिया वालों का आक्रोश शासन और प्रशासन तक पहुंचा, तब आनन-फानन में दाना की मृत पत्नी अमंग के लिए एम्बुलेंस भेजी गई.
. . . ओडिशा सरकार ने फरवरी से महापरायण योजना की शुरुआत की है. इस योजना के तहत अस्पताल में मृत व्यक्ति को उसके घर तक भेजने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था सरकारी खर्चे पर है. कालाहांडी में नई एम्बुलेंस भी उद्घाटन के इंतजार में खड़ी है. अब सोचने वाली बात हैं कि दाना मांझी जैसों के लिए भी देश में कोई कानून है, जिसके तहत देश के दाना मांझी के समकक्ष लोग ससम्मान भारत माता की जय कह सकें. वंदे मातरम गा सकें और तिरंगा यात्रा में अपने को चमका सकें ? दाना मांझी व्यक्ति नहीं प्रतिक है, भारत के गांवो में रह रहे लोगों के लिए. दाना जैसे लोग के परिजन अगर बीमार पड़ जाये तो उनके लिए चिकित्सा की व्यवस्था क्या है, चिंतनीय है. आज के दिन में टीबी जैसे साधारण बीमारी में भी लोग मरने लगे तो यह देश के लिए अपमान की बात है. और 70 वीं आजादी के जश्न के बाद का जवलन्त मुद्दा है कि क्या वाकई हमारा देश तरक्की किया है, या देश के कुछ लोग ? प्रति व्यक्ति आय के तिलिस्म पर सोचने की जरुरत है.
. . . दाना मांझी के कंधे पर पत्नी का शव और बारह वर्षीय बेटी के हाथ में जरुरत के सामानों की झोली के साथ 12 किलोमीटर की यात्रा किसी भी व्यक्ति को झकझोर देती है. इस हृदय विदारक दृश्य को देख कर देश के ठीकेदारों पर भी कुछ असर होता है की नहीं यह समय बताएगा, पर यह घटना वाकई देश के वर्तमान के लिए कलंक है. दाना मांझी ने किसी भी बातों का विरोध क्यों नहीं किया? या दाना का विरोध से ज्यादा ताकतवर वे सफेदपोश थे, जो कानून और तिरंगा के आवरण में अपने को लपेटे हुए रहते है. यह भी सोचने वाली बात है कि बचपन से टूटते-टूटते देश के दाना इसी को नियत्ति मान लेते है. देश को इस शर्म के लिए सोचना पड़ेगा. अब मानवाधिकार आयोग भी जागेगा. सत्ताधीश भी जाँच का आदेश देंगे. लीपा-पोती होगी, कुछ लोग दोषी करार दिए जायेंगे, निलंबित होंगे पर क्या दाना मांझी ने देश को आइना नहीं दिखा दिया? दानियों के देश में, कानूनविदों के देश में, लोकतान्त्रिक देश में दाना मांझी ने सबको झकझोर दिया. क्या इस तरह की घटना राष्ट्रिय शोक का विषय हो सकता है ?



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
September 6, 2016

वास्तव में आज़ाद हम तभी कहलायेंगे जब दाना मांझी जैसे गरीबों को भी उनके परिजनोँ की मृत्यु के बाद लाश को ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस मिले और दाह संस्कार एवं अंतिम क्रिया के लिए आर्थिक सहायता भी मिले .लेकिन इस देश में जिओ के खरीदार हैं और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित हो सके इसके लिए हीं अपने प्रधानम्नत्री चिंतित हैं दाना मांझी जैसे गरीब लोगों के साथ क्या गुजरी इसकी खबर उड़ीसा के नेताओं एवं प्रधानमंत्री को कभी नहीं मिलेगी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव यु ही नहीं भारत को प्राप्त है जी. . डी. पी बढ़ रहा है आर्थिक तरक्की हो रही है विश्व को दिखाना है. अब ऐसे में दाना मांझी के हथ्थे क्या आएगा यह तो भगवन जाने , उड़ीसा का काला हांडी इलाका तो वैसे भी भुखमरी के लिए मशहूर है . राजेश आपका लेख जरूर समाज एवं प्रशासन को आईना दिखानेवाला है लेकिन देखकर अनदेखी करनेवालों के लिए क्या है ?

Jitendra Mathur के द्वारा
August 30, 2016

मर्मभेदी घटना पर लिखा गया अत्यंत मार्मिक लेख है यह आपका । सचमुच ही ऐसी घटना राष्ट्रीय शोक का विषय होनी चाहिए ।

jlsingh के द्वारा
August 27, 2016

आपका आलेख इतना सटीक और सामायिक था कि दैनिक जागरण ने उसे आज ही संदकीय पृष्ट पर छाप भी दिया …वस्तुत: सचमुच दान मांझी ने देश के सिस्टम को आइना दिखाया है … एक झकझोरनेवाला सत्य!

Shobha के द्वारा
August 26, 2016

श्री दूबे जी बहुत मार्मिक प्रसंग आपने उठाया है अपनी पत्नी के शव को स्वयम कंधे पर लाद कर घर ले जाना आज भी यह हाल हैं क्षोभ की बात है |


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