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देश की अस्मिता का प्रश्न

Posted On: 30 Nov, 2016 Social Issues में

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. . . नोटबंदी और कालेधन के हंगामा के बिच आज फिर नगरौटा में देश के सात लाल शहीद हो गए. शहादत की इस सिलसिला को अब हम स्वीकार कर चुके है, ऐसा ही लगता है. देश से ज्यादा धन की चिंता देश वाशियों को है, यह स्पस्ट हो चूका है. सर्जिकल स्ट्राइक की मिठास आज भी हमारे मन में है, पर रोज-रोज की शहादत का मलाल हमें तनिक भी नहीं है, ऐसा ही लगता है. कभी पठानकोट कभी उरी और कभी नाभा जैसे जेल ब्रेक के बाद भी हमारी माथे पर चिंता की लकीर तनिक भी नहीं दिख रही है. एक तरह की गलती बार बार, आखिर कमजोरी कहाँ हैं? जब जो चाहता है घुसपैठ कर लेता है. सरकारी एजेंसियां अपना ड्यूटी पूरा कर रही है, पर हम आम जनता को इसके लिए तनिक भी गुस्सा नहीं आता है.
. . . . देश के जो जवान शहीद हो जाते है उनके घर में मातम पसर जाती है. उनका परिवारिक कुनबा शोकाकुल हो जाता है. क्या सम्पूर्ण देश परिवार की तरह शोकाकुल हो पाता है.? यह विचारणीय है. रोज-रोज का आतंकी हमला हमारी सहनशीलता को दर्शाता है या कमजोरी को यह भी विचारणीय है. शहादत और देश प्रेम की जज्बा नौजवानों में है, देश के लिए गर्व की बात है, पर हम कहाँ असहाय हैं कि हमारे लाल गोली के शिकार लगभग प्रतिदिन हो रहे हैं.
.. … … हथियारों की खरीदारी में भी देश कमजोर नहीं है. जो भी सरकार चुनी जाती है, अपने हिसाब से हथियार जरूर खरीदती है. हथियार खरीदारी के वक्त देश में ऐसा माहौल बनाया जाता है, जैसे हथियार बेचने वाला देश हमारे ऊपर अहसान कर रहा हो. इन सारी हथियारों की उपस्थिति में भी हम असहाय है और हमारे भारत के लाल लगातार शहीद हो रहे हैं यह चिंतनीय है. धन-दौलत सम्मपन्ता सारी चीजें बेकार तब हो जाती है, जब स्वाभिमान पर चोट पहुँचता है.
. ….. .. संसद का एक सम्पूर्ण सत्र देश की अस्मिता के लिए बुलाया जाना चाहिए. रिस्ता सुधरे या टूटे इसी नीति पर बात होनी चाहिए. अमरीका से सम्वन्ध ठीक है पर हम उससे सीखते नहीं हैं. अमेरिका ने अपने देश में हुए आतंकी हमला का बदला ऐसा लिए कि ओसामा बिन लादेन की लाश तक नहीं मिली. भारत के पास अगर इतनी क्षमता नहीं है, तो भी इतना तो हैं ही कि किस्तों की शहादत को एक बार में संपन्न कर लें. इस तरह की इक्षा सिर्फ मेरी अकेली नहीं है, वल्कि सभी भारतीयों की है. सरकार नागरिकों को भी लड़ाई में जाने की इजाजत दे. संक्षिप्त ट्रेनिंग के बाद इस तरह की इजाजत दी जाय के स्वेक्षा से जो युद्ध में जाना चाहे जा सके.
. … … देश में अब ये माहौल बनाना चाहिए की शहीद के शहादत पर शहीद के घर जैसा शोक सम्पूर्ण देश में हो. शहादत का दर्द देश का बच्चा बच्चा समझे यह देश के जिम्मेवार लोगों की जिम्मेवारी है. सर्जिकल स्ट्राइक या पाकिस्तान को सबक सिखाने की हमारी तमाम कार्रवाइयों के बाद भी पाकिस्तान की शैतानी हरकतों में किसी तरह की कमी नहीं आ रहा है. इन कारणों को तलाशने की जरुरत है कि हम कमजोर कहाँ है. जबाबी करवाई में हम ने भी मारा कहने से ज्यादा जरुरी है कि हमारे जवानों को किसी तरह का खतरा न हो,इसका उपाय हो. भारत शांति प्रिय देश है, पर बहादुर देश है इसका सन्देश विश्व बिरादरी तक जाय यह जरुरी है. देश की अस्मिता से जरूरी कुछ भी नहीं है.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashokkumardubey के द्वारा
December 3, 2016

पाकिस्तान द्वारा बार बार हमारे जाबांज सैनिकों का मारा जाना और और उस मौत को शहीद कह के छुट्टी कर लेना आज सर्कार का खाना पूर्ति जैसा काम हो गया है .उधर दुश्मन देश जो दुर्भाग्य से अपना पडोसी देश है वो रोज रोज हमें धमकी देता है की वह एक परमाणु संपन्न देश है कभी भी परमाणु हमला कर सकता है तब जवाब में अपने हुक्मरान भी कहते हैं धौंस न दिया करो हम भी परमाणु अश्त्र रखे हैं . यह सब एक चर्चा परिचर्चा जैसा विषय बना हुवा है .मैं अपना जवान बीटा खो रहीं हैं तो बहुएं विधवा हो रहीं हैं परिवार का कमाने वाला बीटा चला जाता है और उसके सामने पूरी जिदगी पड़ी है .उनपर क्या बीत रही है इसका ख्याल किसीको है कुछ लाख रूपये दे देने से मात्र से उनका दुःख दर्द काम हो जाता है है क्या ? आज देश की जनता पाकिस्तान से बदला चाहती है , उनके जितने भी आतंकी कैम्प हैं उनको बिना वख्त गवाये तहस नहस कर देने हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए आखिर हमारी सर्कार अपने सैन्य बल को इतना कमजोर क्यों समझ रही है ? जरूर हमारी ट्रेनिंग कहीं से कमी आ गयी है वार्ना पाकिस्तानी हमें यूँ ही मार करके नहीं चले जाते . इस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए . एक अच्छा लेख जो सरकार और सेना दोनों की सच्चाई बयां करता है

rameshagarwal के द्वारा
November 30, 2016

जय श्री राम राजेश जी सरकार इस पर बहुत गंभीर है ऐसा बहुत दिनों तक नहीं सहा जाएगा सरकार करने की सोच रही जिसे सार्वजानिक नहीं किया जा सकता लेकिन हमारे यहाँ ऐसे भी नेता जो पाकिस्तानी लोगो में हीरो है क्योंकि बेतुके व्यान देते.किसी भी सैनिक की सहादत से दुःख होते हमारे सांसदों को देखिये आतंकी हमले पर बहस की फिकर नहीं केवल राजनीती करते है सुन्दर भावना


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